संसद के बजट सत्र में राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के अभिभाषण में भी संसद का गतिरोध ही मुख्य मुद्दा रहा. उन्होंने सांसदों से आग्रह किया कि वे सदनों की कार्यवाहियों को बाधित न करे और राष्टï्रीय महत्व के कार्यों पर विचार विमर्श करें.

अब हर संसद सत्र में राष्टï्रपति के अभिभाषण की तरह यह भी परंपरा बन गयी है कि लोकसभा स्पीकर सर्वदलीय बैठक में भी यही अपील करें कि सदन की कार्यवाही बिना बाधा के चलने दी जाए.

संसदीय प्रजातंत्र में पक्ष (सरकार) और विपक्ष के बीच चुनावों में दलों के बीच सत्ता परिवर्तन चलता रहना सामान्य बात है. इस राजनैतिक प्रतिबद्धता व बाध्यता में सत्तारूढ़ पक्ष को यह महसूस करना चाहिए कि यदि वे विपक्ष में होते तो उस विषय पर क्या रूख या नीति अपनाते. इसी संदर्भ में विपक्ष को यह विचार करना चाहिए कि यदि वे सत्ता में होते तो उस विषय पर क्या करते.

आज भारतीय जनता पार्टी सरकार में आ गयी है. लेकिन जब वह विपक्ष में थी तब वह भी संसद में गतिरोध बनाये रखती थी और एक बार तो पूरा शीतकालीन सत्र ही बिना कोई कामकाज किये विपक्ष के हंगामे की भेंट चढ़ गया. आज भारतीय जनता पार्टी सत्ता में तो वह भी वही भुगत रही है. कल की सत्तारूढ़ कांग्रेस आज विपक्ष में है वह भी उसी तरह अड़ंगेबाजी कर रही है और संसद चल नहीं पा रही है. इसी खींचतान में निर्भया कांड का जघन्य अपराधी इसलिये छोडऩा पड़ा क्योंकि संसदीय गतिरोध में वह विधेयक कानून नहीं बन सका जिसके कारण उसे और आगे जेल में ही रखा जाना था. जी.एस.टी. (गुड्स एन्ड सर्विस टेक्स) कांग्रेस के यू.पी.ए. शासन काल से आज तक इसी पक्ष-विपक्ष की खींचतान में अटका पड़ा है.

राष्ट्रपति श्री मुखर्जी ने बजट सत्र का उद्घाटन उनके रस्मी अभिभाषण से कर तो दिया, सांसदों को सलाह भी दे दी कि हंगामा न हो और विचार-विमर्श हो, लेकिन उसके बाद भी यह आशंका बनी ही हुई है कि संसद का सत्र चलेगा या नहीं. कभी सत्ता में बैठी कांग्रेस विपक्ष की भारतीय जनता पार्टी से यह आग्रह करती थी कि कई महत्वपूर्ण कार्य उलझे पड़े हैं- कृपया संसद चलने दे. आज यही बात सत्ता में आयी भारतीय जनता पार्टी कांग्रेस से कह रही कि संसद चलने दीजिए. मुद्दा वही और जस का तस है. केवल पक्ष-विपक्ष में पार्टियों की भूमिका बदली है.

अब तो देश के सामने यह यक्ष प्रश्न बन गया है कि क्या इस देश में कभी संसद चलेगी- क्या इस देश में संसदीय प्रजातंत्र प्रणाली चल पायेगी? यदि देश की राजनैतिक पार्टियों और राजनेताओं का यही रवैया स्थाई रहा तो इस देश में संसदीय प्रजातंत्र ही स्थाई नहीं रहेगा. उसके बाद इस देश में कौन सी शासन व्यवस्था आयेगी- यह भविष्य अंधकार में है.

राष्ट्रपति ने यह कहा जरूर है कि संसद लोगों की ‘सर्वोच्च इच्छाÓ (सुप्रीम विल) को प्रतिबिंबित करती है, लेकिन यथार्थ में यह जनता की सर्वोच्च इच्छा के बिल्कुल विपरीत है कि संसद को न चलने दिया जाए.

राष्ट्रपति ने संवैधानिक दायित्व में उनकी सरकार की विकासोन्मुखी प्रगति का विस्तृत वर्णन किया है. प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी का तकिया कलाम वाक्य ‘सबका साथ सबका विकास’ भी दोहराया. अब उम्मीद न होते हुए भी यही उम्मीद की जा रही है कि संभवत: अब संसद गतिरोध की परम्परा बन गयी राजनीति खत्म होगी और संसद का बजट सत्र राष्ट्र एवं जन कल्याण में चलेगा.

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