Uttrakhand_High_courtनैनीताल,   नैनीताल हाईकोर्ट ने राज्य में राष्ट्रपति शासन को चुनौती देने वाली याचिका पर आज तीसरे दिन भी केन्द्र सरकार को फटकार लगाई और सख्त लहजे में कहा कि राष्ट्रपति का निर्णय कोई राजा का निर्णय नहीं है, जिसकी समीक्षा कहीं नहीं हो सकती.

राष्ट्रपति शासन और लेखानुदान अध्यादेश को चुनौती देने वाली पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की याचिकाओं पर महावीर जयंती का अवकाश होने के बावजूद न्यायालय में आज लगातार तीसरे दिन भी बहस हुई. इस मामले में कल भी सुनवाई होनी है और संभवत: कल फैसला भी आ जायेगा. केन्द्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अपनी दलील को दोहराते हुए जब यह कहा कि राष्ट्रपति का निर्णय किसी दारोगा का निर्णय नहीं है, जिसे कहीं भी चुनौती दी जाए, तो मुख्य न्यायधीश पी जोसफ ने कहा कि राष्ट्रपति का निर्णय किसी राजा का निर्णय नहीं है.

उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति के विवेक और मंशा पर कोई प्रश्न-चिह्न नहीं लगाया जा सकता. लेकिन ऐसा नहीं है कि राष्ट्रपति से कोई गलती न हो. न्यायालय को राष्ट्रपति के फैसलों की समीक्षा का भी अधिकार है.
पूर्णशक्ति किसी को भी गलत बना सकती है और राष्ट्रपति तथा न्यायाधीश भी गलती कर सकते हैं. सब कुछ न्यायिक समीक्षा के दायरे में है.

इससे पहले कल भी उच्च न्यायालय ने केन्द्र के अधिवक्ताओं को कठोर टिप्पणियों से हतप्रभ कर दिया था. अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल मेहता ने कहा कि विधान सभा में विनियोग विधेयक गिरने से राज्य सरकार अल्पमत में आ गई थी. उन्होंने विधि आयोग की सिफारिश और मद्रास उच्च न्यायालय के फैसले का भी हवाला दिया. इस पर न्यायालय ने कहा कि यह कैसे कहा जा सकता है कि विनियोग विधेयक गिर गया था. यह कैसे प्रमाणित किया जा सकता है.

मेहता ने जवाब दिया कि मत-विभाजन की मांग संवैधानिक है. विधान सभा अध्यक्ष मांग स्वीकारने को बाध्य हैं. उन्होंने सरकारिया आयोग की सिफारिश का हवाला दिया. इस पर न्यायालय ने सवाल उठाते हुए कहा कि सिफारिश को उच्चतम न्यायालय ने कानून नहीं माना है. न्यायालय ने यह भी पूछा कि राज्यपाल ने रिपोर्ट में नौ बागियों का जिक्र क्यों नहीं किया.

सिफारिश में 27 भाजपा विधायकों का ही हवाला क्यों दिया. इस पर मेहता ने तर्क दिया कि यह सवाल राष्ट्रपति ने नहीं उठाया. वह चाहते तो राष्ट्रपति शासन की मंत्रिमंडल की सिफारिश को पुनर्विचार के लिए लौटा सकते थे. इसका मतलब है कि राज्य में संवैधानिक संकट था. इस पर न्यायालय ने टिप्पणी की कि राष्ट्रपति और न्यायाधीश भी गलती कर हो सकते हैं. उनके फैसले की भी समीक्षा की जा सकती है.

न्यायालय ने कहा कि राज्यपाल ने नौ बागियों का जिक्र नहीं किया तो केन्द्रीय मंत्रिमंडल को कैसे पता चला कि मत विभाजन की मांग 35 विधायकों ने की थी. बागी विधायकों के अधिवक्ता दिनेश द्विवेदी ने दलील दी कि जब विधायकों ने मत विभाजन की मांग की तो अध्यक्ष ने उसे क्यों नहीं माना. अध्यक्ष को पता था कि सरकार अल्पमत में है.

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