दिल्ली के रामलीला मैदान पर कांग्रेस रैली वास्तव में कांग्रेस रैली है- हालांकि इसे नाम ‘महा रैलीÓ और किसान-खेत मजदूर रैली दिया गया है. वे लगभग 60 दिन देश से बाहर रहे. बड़ी अटकलें लगी- नतीजे निकाले गये. लेकिन ऐसा आभास दिया जा रहा है कि वे बैंकाक में विपश्यना योग साधना के लिये गये थे.

यह भारत की ही विधा है. थाईलैंड में उसमें ऐसा क्या विशेष है यह उनका निजी मामला माना जा रहा है. यह भी नहीं माना जा सकता कि उन्हें ‘लान्चÓ किया जा रहा है. वे अभी भी पार्टी के उपाध्यक्ष हैं और यह लगभग निश्चित सा ही लग रहा है कि अगले ए.आई.सी.सी. सेशन में पार्टी अध्यक्ष बन जाए. वर्तमान अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी किसी बीमारी के चलते उनका अमेरिका में आपरेशन हो चुका है. यह अनुमान है कि ये स्वास्थ्य कारणों से श्री राहुल गांधी को पार्टी नेतृत्व सौंप दे.

इन दिनों सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की मोदी सरकार व विपक्ष की कांग्रेस सरकार के बीच राजनैतिक शक्ति परीक्षण भूमि अधिग्रहण विधेयक को लेकर हो रहा है. यह मामला संसद के सक्षम भी है और अध्यादेश में देश में लागू किया जा रहा है. वैसे यह विधेयक कांग्रेस नेतृत्व की पिछली मनमोहन सिंह की यू.पी.ए. सरकार लायी थी. उस समय भारतीय जनता पार्टी विपक्ष में थी और उसने इस विधेयक का समर्थन किया था. विधेयक में एक बहुत ही अहम मुद्दा अधिग्रहण के बारे में ही था कि उसी जमीन का अधिग्रहण किया जायेगा जिस पर उसके 70 प्रतिशत मिल्कीयत वाले हितग्राही किसान सहमति दे दें और दूसरा प्रावधान यह था कि यदि उस भूमि पर उस उद्देश्य के लिए 5 साल तक उपयोग नहीं हुआ तो वह जमीन हितग्राही किसान को वापस कर दी जायेगी. उस समय विपक्ष में बैठी भारतीय जनता पार्टी के सांसदों ने यह तक कहा कि सहमति 70 प्रतिशत से बढ़ाकर 100 प्रतिशत तक की जाए. लेकिन अब जब वह सत्ता में आयी तो उसने कांग्रेस सरकार के उस मूल विधेयक में यह परिवर्तन कर दिया कि किसानों से सहमति नहीं ली जायेगी और सरकार ही तय करेगी कि कहां की जमीन लेना है. इसी तरह जमीन का उपयोग न होने पर 5 साल बाद जमीन वापस करने के प्रश्न भी संशोधन कर ‘समय सीमाÓ को खत्म कर दिया गया है.

ये दो मुद्दे कांग्रेस व भाजपा के बीच राजनैतिक प्रतिष्ठा के बन गये हैं. श्री राहुल गांधी ने ही इसका ‘संसद से सड़क तकÓ विरोध का ऐलान कर दिया है और दिल्ली रैली से उसका शंखनाद कर दिया है.

रैली में उन्होंने जबरदस्त प्रहार करते हुए कहा कि विधेयक में संशोधन उद्योगपतियों व कम्पनियों के लिये लाये जा रहे हैं. चुनाव में भाजपा ने उनसे भारी कर्जा लिया था और इन भूमि अधिग्रहण पर इस संशोधन में उसे चुकाया जा रहा है. अन्य विपक्षी दल भी उनके पार्टी स्तर इस संशोधनों का विरोध कर रहे हैं. भाजपा इसे अध्यादेश व संसद का संयुक्त अधिवेशन बुलाकर इसे कानून बनाना चाहती हैं. ‘सहमतिÓ के संशोधन पर उनकी दलील है कि इसका प्रयोग या दुरुपयोग केवल इस बात पर हो जायेगा कि सहमति तभी बनेगी या मिल पायेगी जब मुआवजा राशि बढ़ा दी जाए. इससे अकारण की सौदेबाजी हो जायेगी. आने वाले दिनों की मुख्य राजनीति इस बात को साबित करने के लिए होगी कि भाजपा उद्योगपतियों के साथ है और कांग्रेस किसान-खेतिहर मजदूर के साथ उनके हित संरक्षण के लिये कटिबद्ध होकर इस प्रश्न पर संघर्ष को संसद से सड़क तक चलायेगी.

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