biharनई दिल्ली,  चुनावी राजनीति में लहर शब्द के बड़े मायने हंै. हारने वाला हो या जीतने वाला लहर शब्द से परहेज कर ही नहीं सकता है. इन दिनों बिहार चुनाव में भी लहर को लेकर खुब चर्चा है. दोनों गठबंधन के नेता एक दूसरे के खिलाफ लहर होने का दावा करके अपने-अपने पक्ष में ही सुनामी व तुफानी लहर होने की बात से मतदाताओं को रिझाने के प्रयास में लगे हुए हैं.

इसी वजह से माना जा रहा है कि गलत या सही जिसने भी अपने पक्ष में लहर होने की बात गांव-गांव तक पहुंचाने में सफलता हासिल कर ली वह निश्चित ही माहौल को प्रभावित करने में सफल हो सकता है. यानी इन दिनों बिहार चुनाव में सबकुछ लहरों के भंवरजाल में ही उलझा हुआ है.

बिहार चुनाव के संदर्भ में इन दिनों दोनों पक्षों के नेता लहर पर ही केन्द्रीत बात कर रहे हैं. लहरों का आवेग मतदान के चरणों के साथ ही हिचकोले मार रहा है. जहां एक ओर महागठबंधन के नेताओं का दावा है कि प्रथम व दूसरे चरण के चुनाव में उनके पक्ष में तुफानी लहर रहा है और इसी आधार पर वे आगे की चुनावी वैतरणी पार करके सत्ता कायम रखने में सफल होंगे. वहीं दूसरी ओर राजग के नेताओं का दावा है कि उक्त दोनों चरणों में उनके पक्ष में अंडर करेंट रहा है यानी आंतरिक लहर. लेकिन बाकी बचे चरणों में सुनामी लहर आने वाली है जिसके बदौलत वे सभी संभावनाओं को पीछे छोड़कर बिहार में बदलाव लाएंगे.

हालांकि इन सबके बीच राजनीतिक प्रेक्षकों की अपनी अलग राय है. उनका मानना है कि लड़ाई का रूख एकदम बदल गया है. अंडर करेंट की बात सिर्फ सांत्वना के लिए जायज है. क्योंकि बिहार में जातिवाद का लहर अभी भी कायम है और जिसके पक्ष में जातियों का अंकगणित है वहीं आगे बढ़ रहा है. प्रेक्षकों का मानना है कि इस चुनाव में भी जाति की राजनीति पार्टी की राजनीति पर भारी पड़ रही है. ऐसे में सुनामी को लेकर अभी भी असमंजस है.

– प्रवेश कुमार मिश्र