मानसून सत्र के पहले दिन 21 जुलाई को सुषमा-ललित मोदी प्रकरण पर राज्यसभा में पक्ष-विपक्ष के द्वन्द पर राज्यसभा नहीं चली. लोकसभा में श्रद्धांजलि के बाद काम नहीं हुआ, लेकिन यह तय लग रहा था कि दूसरे दिन लोकसभा में भी यही होगा और वही हुआ और कुछ ज्यादा हुआ. कांग्रेस व विपक्ष के सांसद काली पट्टïी बांध और हाथ में प्ले कार्ड- ‘मोदी चुप्पी तोड़ो’ और ‘बड़े मोदी मेहरबान, छोटे मोदी पहलवान’ लिखे लिये हुए थे. गतिरोध दोनों सदनों में एक-सा हो रहा है. शासन पक्ष चाहता है कि सुषमा पक्ष पर चर्चा हो और वसुन्धरा व मध्यप्रदेश का व्यापमं प्रकरण राज्यों के संबंधित है और संसद या केन्द्र सरकार का विषय नहीं है. विपक्ष का दोनों सदनों में कहना था कि वसुन्धरा राजे व मोदी प्रकरण राज्य क्या वह तो राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय हो गया है और व्यापमेंं भारत के अन्य राज्यों तक फैला है. सुषमा-वसुन्धरा व शिवराज के इस्तीफे होने ही चाहिए.
यह मामला अब ऐसा हो गया है कि जैसे यह स्पेक्ट्रम-कोल ब्लाक- भाग दो है. यू.पी.ए. काल में वह भाग एक था. गतिरोध का तरीका उस वक्त और इस वक्त एक-सा ही हो गया है. फर्क सिर्फ इतना है कि उस वक्त भाजपा विपक्ष और कांग्रेस सत्ता में थी और अब बाजी पलट में कांग्रेस विपक्ष और भाजपा सत्ता में है.

हर व्यवस्था के कुछ मूलभूत सिद्धान्त होते हैं. संसदीय प्रजातंत्र प्रणाली दलों के बीच में सत्ता आती-जाती रहती है. उस परिप्रेक्ष्य में यह कहा गया है कि शासन पक्ष यह सोचकर व्यवहार करे यदि वह विपक्ष में होता तो उस मुद्दे पर क्या करता और विपक्ष के बारे में यह कहा गया कि वह सोचकर आचरण करे यदि सत्ता में आया तो ऐसे मुद्दों पर उसका क्या रुख होता. भारत की संसद व विधानसभाओं में ऐसा आचरण नहीं किया गया और हमारी संसदीय व्यवस्था में हल्ला-हुड़दंग व गतिरोध ही लगातार रहने लगा. संसदीय नियमों में यह प्रावधान है कि हर सदस्य उसके स्थान से ही तभी बोलेगा जब स्पीकर बुलायेगा. लेकिन इन दिनों सदन में जो पार्टी विपक्ष में हो वह अध्यक्ष की आसंदी के सामने जमा होकर अपनी मनमर्जी से एक साथ बोलते हैं. भारतीय संसद में अब यह नियम ‘डिस्कस एंड डिसाइड’नहीं चलता.

संसद में सत्तारुढ़ मोदी सरकार व्यापमं को राज्य का मुद्दा मान रही है. राज्य की एस.टी.एफ. ने दूसरे राज्यों में भी दबिश देकर गिरफ्तारियां की हैं. राज्यपाल श्री रामनरेश यादव का व्यापमं में लिप्त पुत्र शैलेष यादव लखनऊ फरार हो गया था और वहीं संदिग्ध अवस्था में उसकी मृत्यु हुई. बिहार में भी गिरफ्तारियां हुई हैं. अन्य राज्यों के लोग इसमें आये-गये हैं. यह कहीं से भी मध्यप्रदेश तक सीमित राज्य का मामला नहीं है. सत्ता पक्ष, राज्य व केंद्र इसमेंं बुरी तरह फंस गये हंै इसलिए अपने बचाव में कुछ भी औचित्यहीन दलीलें दी जा रही हैं.
जब इसे राज्य का मामला कहा जा रहा है तो कांग्रेस इस मामले पर राज्य की विधानसभा को भी नहीं चलने देगी और यही हो रहा है. निश्चित ही पहले के घपलों में सत्तारुढ़ कांग्रेस ने भी बचने के लिए इसी तरह के हाथ-पांव मारे थे. भाजपा ने भी संसद का संचालन ठप्प किया था.

अब दोनों ही प्रमुख राजनैतिक दल उन परिस्थिति से गुजर चुके हैं जिसमें अब दोनों को उनके आधार पर मुंह की खानी पड़ रही है. इसलिए अब उसे उपयुक्त वातावरण मान कर लोकसभा के स्पीकर, राज्यसभा के सभापति व राज्य विधानसभाओं-विधान परिषदों के सभापति संसदीय आचरण पर राजनैतिक दलों का वृहत सम्मेलन बुला संसदीय आचरण पर आचार संहिता बना ले.
अब केंद्र व राज्यों में दलों के बीच चुनावों में सरकारें बदलती रहती हैं. लगभग सभी के लिए सत्ता व विपक्ष आने-जाने का सिलसला चल ही पड़ा है. उस परिप्रेक्ष्य में संसद व विधानसभाओं को व्यवस्थाओं के अनुसार चलना ही चाहिये. इस समय यह प्रश्न प्रमुख नहीं है कि इसमें कितना रुपया बरबाद हो जाता है बल्कि प्रश्न यह है कि इस देश की संसदीय प्रणाली की व्यवस्था चलेगी कि नहीं. यदि नहीं तो फिर कौन सी शासन प्रणाली चाहिये या आयेगी.