मौसम विज्ञान के अनुसार प्रशांत महासागर क्षेत्र में अलनीनो का प्रभाव इस बार दक्षिण एशिया के देशों में भारत, पाकिस्तान व श्रीलंका में वर्षा को बिगाड़ सकता है और आशंका है कि सूखे की स्थिति खेती में आ सकती है.

भारत में पिछले साल की वर्षा मौसम विज्ञान के आंकलन में बड़ी ही विचित्र स्थिति रही. देश में वर्षा लगभग 900 मिलीमीटर होती है. गत वर्ष वर्षा ऋतु में सामान्य से 11 प्रतिशत कम वर्षा हुई. लेकिन गर्मी के मौसम में बेमौसम बरसात हो गई. इससे फायदा तो कुछ हुआ नहीं, उल्टे खेती का क्रम बिगड़ गया और फसलें बर्बाद हो गईं. जब फसल पकने व कटने का मौसम था, उसी समय बरसात ने सब कुछ अस्त-व्यस्त कर दिया. इस साल 15-16 में मौसम विज्ञान का आंकलन है कि अभी तक यह अनुमान था कि बरसात 93 प्रतिशत तक हो जायेगी, लेकिन अब अनुमान हो रहा है कि यह और घटकर 88 प्रतिशत तक रहे. भारतीय कृषि मौसम के अनुसार 96 से 104 प्रतिशत वर्षा सामान्य मानी जाती है. 90 से 96 प्रतिशत की कमी सामान्य से कम है. 20 प्रतिशत से कम हो तो सूखे की स्थिति बनती है. भारत की लगभग 900 मिलीमीटर की कुल वर्षा में यदि 12 प्रतिशत कम वर्षा हुई तो देश में 794 मिलीमीटर वर्षा होगी. यदि कम वर्षा भी खेती के कार्यक्रम के अनुसार ठीक समय पर होती और रुकती हुई चल जाए तो कम वर्षा का कोई भी दुष्प्रभाव महसूस भी नहीं हो पाएगा.

पिछले साल की वर्षा का आंकलन करें तो वर्षा 11 प्रतिशत कम थी, लेकिन रबी की सभी फसलें इसलिये बम्पर आ गयी थीं कि वर्षा क्रम ठीक चला था. वह तो गर्मी के मौसम में बेमौसम की बरसात ने ही सब कुछ बिगाड़ दिया था.
कई बार ऐसा भी हुआ कि अलनीनो की स्थिति प्रशांत महासागर में बनती है तब भी मानसून की सामान्य वर्षा हो जाती है.

इस बार अंदेशा और आशंका बहुत है. ऐसी स्थिति में धैर्यपूर्वक अभी से ऐसी व्यवस्था कर लें कि जो भी बरसात हो उसका पानी बहकर न निकले बल्कि बरसते ही जगह-जगह तालाब-पोखरों में जमा हो जाए. किसान को अपने खेत में ही एक किनारे कुछ जमीन पर छोटा-सा तालाब बना लेना चाहिये जिससे तालाब में जमीन बहुत थोड़ी ही दबेगी, लेकिन पूरे खेत को जो सिंचाई मिलती रहेगी उससे जो प्राप्ति होगी वह बहुत ज्यादा होगी.

शासकीय स्तर पर बलराम तालाब व उमराव तालाब का बड़ा हल्ला मचा कि इससे ग्रामीण जल व्यवस्था में क्रांतिकारी परिवर्तन हो जायेगा. एक-दो पुरुस्कार समारोह के बाद में ऐसी योजनाओं का ऐसे संकट के समय मेें यह उल्लेख कभी नहीं आया कि वर्षा तो कम हुई थी, लेकिन बलराम व उमराव तालाबों ने उस संकट का कोई असर नहीं होने दिया बल्कि यह खबरें आ जाती हैं कि जंगलों में पानी की कमी हो गयी है. वन्य प्राणी पानी की तलाश में शहरी क्षेत्रों में आ जाते हैं.
जो भी पानी गिरे यदि वह जल स्रोतों में आ जाए तो ऐसी मुसीबतें भी आसानी से टल सकती हैं जिनकी दस्तक सुनाई दे रही है.

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