अब देश में ïवर्षा को बाढ़ कहा जाना चाहिए. इसे चाहे उन्नति कह लें या अवनति- अब यथार्थ यही है. एक लम्बे अर्से पहले केवल नदी या बड़े नालों के किनारे के शहरों व गांवों में उसी समय बाढ़ आती थी जबकि कई दिनों की झड़ी लगकर बरसात होने पर नदी-नालों में उफान आ जाता था. ऐसे बाढ़ का पैमाना भी उस पर किसी जगह बने पुल का डूबना या पानी का तट से ऊपर बहकर बस्तियों में आना होता था. अब हालत यह है कि अगर वर्षा न आये तो आफत और आ जाये तब भी आफत. पहले नगर-कस्बों-गांवों का ïवर्षा जल नालियों से फौरन ही निकल जाता था. अब पानी निकलता नहीं है क्योंकि नालियां नहीं हैं, जो हैं वे हमेशा कचरे से ‘चोकÓ रहती हैं. स्वच्छ भारत अभियान में कभी आगे जाकर हो सकता है कचरे के निष्पादन से इसका समाधान हो जाए.

मुम्बई में हमेशा से मूसलाधार वर्षा होती है. इसे देखने रेगिस्तानी इलाकों के अरब राष्ट्रों से पर्यटक आया करते हैं. मुम्बई समुद्र तट पर है. इस शहर के जनजीवन में एक रफ्तार है जो मुम्बई की विलक्षण गतिशीलता है. मुम्बई दौड़ता रहता है. इसी तरह मुम्बई की घनघोर वर्षा जल भी मुम्बईया रफ्तार से फौरन इधर गिरा और उधर समुद्र में समा गया. लेकिन अब मुम्बई वर्षाकाल में दो की जगह तीन समुद्र हो जाते हैं. मुम्बई के पूर्व में मुम्बई की खाड़ी (बे) और पश्चिम में अरब सागर है. ïवर्षा में अब पूरा मुम्बई नगर ही तीसरा समुद्र हो जाता है. अब उसका पानी बहकर समुद्र में नहीं जाता बल्कि पूरा महानगर ही डूबकर समुद्र बन जाता है.

देश की राजधानी दिल्ली यमुना नदी के तट पर बसी है, लेकिन अभी इन दिनों यमुना में बाढ़ नहीं आयी है, लेकिन दिल्ली में बाढ़ आ गयी है.
मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल की भौगोलिक पहचान ‘बड़ा तालाबÓ है. वह कहावतों में आ चुका है- ‘तालों में भोपाल तालÓ. लेकिन भोपाल में 22 जून की शाम मानसून ने धमाकेदार आमद दी. एक घंटे में 110 साल का रिकार्ड तोड़ 9.22 सेन्टीमीटर वर्षा हुई और भोपाल ताल का शहर ही दूसरा ताल बन गया, जो भौगोलिक तालाब से भी बड़ा हो गया. हर जगह जल भराव और जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो गया. यह हालत गिने-चुने शहरों में नहीं बल्कि हर शहर-कस्बे-गांव की है. सड़कों की संरचना में हमेशा से उसके दोनों किनारों पर नालियां होती इसलिये हैं कि पानी सड़कों व बस्तियों में ठहरे नहीं और फौरन निकल जाए. सड़कें और उसके दोनों किनारे की नालियां दोनों समानान्तर रचनायें हैं- एक-दूसरे की पूरक व्यवस्थाएं हैं.

केन्द्र व राज्य सरकारों में केपिटल प्रोजेक्ट, शहरों के विकास प्राधिकरण, शासकीय टाऊन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग आदि बड़े-बड़े संस्थान शहर व ग्राम के विकासों में लगे हैं. हर जगह मास्टर प्लान, ग्रीन बेल्ट के चर्चे हो रहे हैं. मध्यप्रदेश में तो मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने तो राज्य के हर गांव का मास्टर प्लान की घोषणा कर चुके हैं. सड़कें चौड़ी हो रही हैं. प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री सड़कें योजनाएं बनी हुई हैं. इन सब भारी भरकम प्रशासन में वह नाली नजर नहीं आती जो जन-जीवन को अस्त-व्यस्त न होने दे. कहीं वर्षों पूर्व 60 के दशक में सन् 1936 के बाद के दूसरी बार नर्मदा की बाढ़ का पानी होशंगाबाद में घुसा था. उसके बाद से शहर में नर्मदा की बाढ़ तो नहीं आयी लेकिन वर्षा की बाढ़ हर साल बराबर आने लगी है.

यह हाल सब जगह है कि वर्षा बाढ़ बनकर आने लगी है. खेती और खेतों के लिए सुखद है और शहर-कस्बों के लिए आफत है. वर्षा गयी और शासन, प्रशासन व आम जनता इस तरफ से फिर अनजान हो जाती है.

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