भारत और पाकिस्तान के बीच 23-24 अगस्त को होने वाली राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों के बीच प्रस्तावित यात्रा पाकिस्तान ने इस बात पर रद्द कर दी कि उसे वार्ता के लिये भारत की शर्तें मंजूर नहीं है.

वास्तविकता यह है भारत ने उसे यह बताया था कि आतंक सुरक्षा की समस्या है जो सुरक्षा सलाहकारों, सुरक्षा एजेंसियों, पेरा मिलिट्री और फौजों का मामला होता है. काश्मीर का मसला राजनैतिक है और इस पर राजनैतिक स्तर पर वार्ता होती है जबकि सुरक्षा सलाहकार सरकारी अधिकारी (सिविल सर्वेन्ट) होते हैं और वे राजनैतिक वार्ता करने या उसके निर्णय लेने के अधिकार प्राप्त व्यक्ति नहीं होते हैं.
रूस के उफा नगर में भी शंघाई कोआपरेशन शिखर सम्मेलन के अवसर पर भारत व पाकिस्तान के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी और श्री नवाज शरीफ के मध्य जो मुलाकाती बात हुई थी, उसमें तय भी यह हुआ था कि दोनों देशों के उच्च सुरक्षा अधिकारी भारत के श्री अजीत डाभोल और पाकिस्तान केे श्री सरताज अजीज पहले सुरक्षा व आतंक के प्रश्न पर बात कर लेें.ं उसके बाद विदेश मंत्री स्तर की बात हो जायेगी. उसके साथ ही श्री नवाज शरीफ ने श्री नरेन्द्र मोदी को पाकिस्तान आने का निमंत्रण दिया जिसे उसी समय श्री मोदी ने स्वीकार कर लिया.

उफा में दोनों के बीच यह तय ही था कि अब आपसी संबंधों को बढ़ाना व सभी मसलों को सिलसिलेवार हल करना है. लेकिन पाकिस्तान की अन्दुरुनी हालत ऐसी हो गयी है कि वहां नागरिक (डेमोक्रेटिक) सरकार को पहले मिलिट्री ‘डिक्टेटÓ करती रही. अब मिलिट्री के साथ तालिबानी, लश्करे तैयबा आतंकी संगठन भी सरकार को उनके दबाव में चला रहे हैं.

उफा से लौटते ही श्री नवाज शरीफ का विरोध होने लगा कि उन्होंने उफा में श्री मोदी से केवल आतंक के प्रश्न पर ही क्यों बात की. उन्होंने काश्मीर का मसला क्यों नहीं उठाया. आतंकी हाफिज सईद ने यह मांग कर दी कि नवाज शरीफ भारत से वार्ता नहीं करें. उसी समय यह लगने लगा था कि श्री शरीफ दबाव में कुछ कर नहीं पायेंगे. उन्होंने यह दिखाने के लिये वे काश्मीर के प्रति भी सचेत हैं इन दिनों काश्मीर क्षेत्र में सीमा उल्लंघन के फौजी गोलाबारी कराने लगे. उफा वार्ता के बाद से पाकिस्तान अब तक काश्मीर क्षेत्र में 96 बार सीमा पर गोलाबारी कर चुका है और यह सिलसिला जारी है. श्री शरीफ भी बड़े ही बदकिस्मत प्रधानमंत्री हैं जब भी कुछ करना चाहा, फौज व आतंकी मटियामेट कर देते हैं.
पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी से उन्होंने लाहौर बस डिप्लोमेसी में संबंध बहुत हद कर सुधारे ही थे कि उनके ही सेनाध्यक्ष जनरल परवेज मुशर्रफ ने कारगिल युद्ध से उसे चौपट कर दिया. अभी उफा में उन्होंने बात बढ़ाई तो यह प्रगट हो गया कि फौज के नियंत्रण में चलने वाली पाकिस्तान की आई.एस.आई. और आतंकी लश्करे तैयबा ने नावेद के साथ दो आतंकी जम्मू में आतंकी हमला करने भेज दिये. आई.एस.आई. और हाफिज सईद नहीं चाहते हैं कि नवाज शरीफ का वहां किसी तरह मर्तबा व रुतबा बढ़े इसलिये वह उन्हें हुकूमत करने ही नहीं दे रहे हैं.

फौज व आतंकी नहीं चाहते थे कि भारत-पाक वार्ता होनी चाहिए. मजबूर नवाज शरीफ को अधिकारी स्तर पर राजनैतिक स्तर की वार्ता की बात उठाकर उसे रद्द करना ही पड़ा.