यह एक त्रासदायी और अनिवार्य हो गया यथार्थ है कि ताप (थर्मल) बिजली घरों से कोयला जलाने से कार्बन गैस और पेट्रोल डीजल के वाहनों से मोनो आक्साइड गैसों के उत्सर्जन से वातावरण दिनोंदिन प्रदूषित होने से जनजीवन दूभर होता जा रहा है. दूसरी और इनकी अनिवार्यता यह है कि बिजली और वाहनों के बिना अब जीवन ही ठप्प हो जायेगा, जो किया नहीं जा सकता है.

चाहे पेरिस में संसार के सभी देश शिखर सम्मेलन करें या दिल्ली की केजरीवाल सरकार दिल्ली में कारों को पूर्ण और अपूर्ण नंबरों के आधार पर संचालित करने का निर्णय लें, समस्या फिलहाल जहां की तहां ही रहेगी. न तो थर्मल बिजली प्लांट बंद किये जा सकते हैं और न ही वाहनों को बंद किया जा सकता है. लेकिन यह भी अनिवार्य हो गया है कि अब इनका विकल्प ढूंढना होगा अन्यथा संसार का यह बिजली यातायात का विकास हमारा विनाश बन जायेगा. तमाम स्वास्थ्य सुविधाओं के बाद भी इनके प्रदूषण बीमारियों से जीना भी दूभर कर देंगे.
इसका समाधान यही हो सकता है कि जल्दी से जल्दी वैज्ञानिक या तकनीकी आधार पर ताप बिजली और पेट्रो-डीजल वाहनों का विकल्प ढूंढना होगा. ताप बिजली के विकल्प तो परमाणु, जल (हाइड्रो), विद्युत, सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा के रूप में विकसित किये जा रहे हैं.

पेट्रोल-डीजल वाहनों की जगह बेटरी या इलेक्ट्रानिक वाहनों के नमूने तो बाजार में आने लगे है लेकिन वे चलन में कब तक आयेंगे अभी इसका कोई अन्दाजा नहीं हो रहा है.

कोयला कार्बन गैस उत्सर्जन से सबसे पहले और सबसे बड़ी राहत या छुटकारा भारतीय रेल समाज को दे चुकी है. उसने अपने पूरे नेटवर्क में कोयला से चलने वाले स्टीम लोकोमोटिव इंजिनों को चलन से बाहर कर दिया. अब रेलों का संचालन बिजली और डीजल इंजिनों से हो रहा है. इनसे कार्बन का उत्सर्जन पूरी तौर पर खत्म होगा. डीजल इंजिनों से जरूरत मोनो आक्साइड वातावरण में आ रही है.

संसार को सूर्य के ताप से प्रकृति भरपूर ऊर्जा दे रही है. संसार अभी तक उसका दोहन नहीं कर पाया. भारत तो हर दिन सूर्य प्रकाश का देश है. यह विश्व की बढ़ती हुई व्यवस्था है. इस देश के वैज्ञानिकों को यह बड़ी चुनौती है कि वे जल्दी से जल्दी पूरे देश को सौर ऊर्जा से भरपूर कर दे- यह भारत का सारे विश्व को भी जीवन जीने के लिये सबसे बड़ा उपहार होगा. ऊर्जा के विकल्प में इस समय अन्य सभी ऊर्जा मेें सुगम व सरल परमाणु ऊर्जा है. लेकिन जापान के फूकूशिमा परमाणु विद्युत संयंत्र की सुनामी व भूकंप से हुई दुर्घटना ने सारे संसार को दहला दिया और जर्मनी जैसे देश ने घबरा कर अपने 22 न्यूक्लियर पावर प्लान्ट बन्द कर दिये. फिर भी यह माना ही जाता है कि दुर्घटनाएं तो सभी क्षेत्रों में यदा-कदा होती ही रहेंगी, उन्हें उसमें सर्वत्र व हमेशा की घटना नहीं माना जाता. बचत प्रावधान भी ढूंढ लिये जाते हैं. दुर्घटना के डर से कहीं भी कभी पूरा काम खत्म नहीं किया जाता. लेकिन दिल्ली में कारों का चलन एक दिन के अन्तर से चलने का फार्मूला अव्यवहारिक व तुगलकी लगता है- जो चल नहीं पाएगा.