जापान की वित्तीय सेवा कंपनी नोमुरा ने यह अनुमान लगाया है कि भारत की वृद्धि दर- जी.डी.पी. सन् 2018 में 7.5 प्रतिशत रह सकती है. अभी भारत की विकास दर 6 से 7 प्रतिशत के बीच घटती बढ़ती हुई चल रही है. आमतौर पर यही अनुमान है कि यह कम से कम 6 और ज्यादा से ज्यादा 8 प्रतिशत तक जा सकती है. इसकी औसत दर 7 प्रतिशत के आसपास ही एक अर्से से बनी हुई है.

जापान की नोमुरा कंपनी के अनुमान उन बातों पर आधारित है जिन क्षेत्रों में भारत और जापान का व्यापार चलता है. इंजीनियरिंग सामान में जापान से काफी आयात होता है और इस क्षेत्र में भारत का बाजार व्यापार पाने में जापान और दक्षिण कोरिया की स्वस्थ प्रतियोगिता चलती रहती है.

नोटबंदी से भारत की अर्थव्यवस्था और पूरे व्यापारिक क्षेत्रों को बहुत धक्का लगा था. लोगों के पास और बाजार में भी करेंसी का भारी अभाव हो गया था और खरीददारी न्यूनतम स्तर पर आ गयी थी.

उसी दौर में 500 और 1000 का नोट बंद कर दिया और उनके साथ में 2000 का नोट पहली बार देश की मुद्रा में लायेे. बाजार में 500 और 1000 के नोट न होने से 2000 रुपये के नोट का चलन मात्र 100 रुपयों पर निर्भर हो जाने से वह बाजार की रिटेलिंग में नहीं आ सका.

अब संकेत दिये गये हैं कि 500 का नया नोट आ गया है और 1000 का आने वाला है. इसके साथ ही 2000 का नोट बिना बंद किये धीरे-धीरे चलन से खत्म किया जायेगा. बैंकों में जो 2000 के नोट आयेंगे वे पुन: चलन में नहीं लाये जायेंगे.

राज्यसभा सांसद एवं अर्थशाी श्री सुब्रामण्यम स्वामी ने कहा है कि सरकार विकास दर के दो आंकड़े पेश कर रही है और दूसरे देशों से करा रही है वे सब फर्जी आंकड़े हैं.

हकीकत यह है कि नोटबंदी से भारत की अर्थव्यवस्था चौपट हो गयी है और देश की विकास दर 6.1 प्रतिशत है. ऐसे आंकड़े पिछले तीन-चार महीने की स्थिति बताते हैं. नोटबंदी को सफल बनाने के लिए सरकार खुद बढ़े-चढ़े फर्जी आंकड़े संस्थाओं पर दबाव डालकर या उन्हें किसी तरह उपकृत करके जारी कराती जा रही है.

प्रधानमंत्री श्री मोदी व उनके वित्त मंत्री श्री अरुण जेटली की नीतियों व नोटबंदी से अर्थव्यवस्था को काफी झटका लगा है.भारत के ऐसोसियेटिड चेम्बर ऑफ कामर्स एंड इंडस्ट्रीज ने कहा कि नोटबंदी के आघात के बाद भारत की अर्थव्यवस्था अगले साल 2018 में 7 प्रतिशत ही पहुंच सकती है और मुद्रास्फीती 4 से 5 प्रतिशत हो सकती है.

कर्नाटक, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश विधानसभाओं के चुनाव 2018 और उसके बाद 2019 में लोकसभा चुनाव आ रहे है. इसलिये राज्य व केंद्र सरकारों का जोर कृषि क्षेत्र की तरफ ज्यादा होगा.सरकारों के आने वाले बजटों में काफी झुकाव किसानों व कृषि की तरफ होगा. उद्योगों पर इसलिए कृषि से कम ध्यान दिया जायेगा और उनसे अधिक रोजगार निर्माण की अपेक्षा की जायेगी.

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