इस समय देश में अब तक का विदेशी मुद्रा भंडार उच्चतम स्तर पर है. इस वृद्धि में मुख्य योगदान देश में विदेशी मुद्रा आस्तियों (फारेन करेन्सी एसेेस्टेस्) में सुधार की वजह से हुआ है. पिछले वर्ष जून में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 355.46 अरब डालर के उच्च स्तर पर पहुंच चुका है, लेकिन अभी 2539 अरब डालर की वृद्धि होने से यह उच्चतम स्तर 355.947 अरब डालर पर पहुंच गया है.

इस समय विदेशी मुद्रा भंडार का उच्चतम स्तर पहुंचने की एक बड़ी खासियत यह है कि इस समय देश का निर्यात काफी कमजोर चल रहा है. हम अभी तक गेहूं का निर्यात करते हैं, लेकिन पिछले तीन सालों में प्राकृतिक आपदाओं से गेहूं पर ऐसी मार पड़ी कि उससे हमारा गेहूं निर्यात विपरीत होकर गेहूं का आयात बन गया है.

गेहूं की क्वालिटी इतनी गिर गयी कि देश के बड़े आटा या खाद्य पदार्थ बनाने वाले बड़े उद्योगों ने देश को गेहूं न खरीद कर विदेशों से भारी मात्रा में आयात कर लिया. सरकार ने समर्थन मूल्य पर वह गेहूं खरीदा जो खाने लायक ही नहीं था और उसे सार्वजनिक वितरण प्रणाली में खपाया गया. सरकार की खरीद गेहूं के पीडि़त किसानों को एक तरह महज उसे राहत देने के लिए थी.

सरकार को गेहूं का बढ़ता आयात रोकने के लिये और देश के किसानों को सस्ते आयात की मार से बचाने के लिये उसे गेहूं पर आयात शुल्क लगानी पड़ी जो अभी तक कायम है और इसी मार्च में उसकी अवधि और आगे बढ़ायी जा रही है. इस महीने के अंत तक नये सीजन के गेहूं की आवक शुरू हो जायेगी. इस समय अंतरराष्टï्रीय स्थिति यह हो गयी है कि इसे बाहर से आयात किया जाने वाले गेहूं देश में पैदा गेहूं से सस्ता पड़ रहा है. विदेशों से गेहूं के भारी आयात को देखते हुए पिछले साल 2015 अगस्त में गेहूं पर 10 प्रतिशत आयात शुल्क चला आ रहा था और सरकार ने अक्टूबर से इसे बढ़ाकर 25 प्रतिशत कर दिया और इसे 31 मार्च के बाद भी बनाये रखने का इरादा है.

भारत में गेहूं केवल रबी मौसम में होता है और यदि यह प्राकृतिक आपदा से बिगड़ जाये तो गेहूं किसान तबाह हो जाता है और देश में गेहूं का अभाव और आयात दोनों एक साथ हो जाते हैं. इस साल भी मौसम की खराबी से गेहूं का उत्पादन कम होने की आशंका जतायी जा रही है. इसकी वजह अभी फरवरी-मार्च में अनेकों जगह वर्षा होने और ओले गिरना है.

गेहूं और चावल भारत की प्रगति का पैमाना है. अंग्रेजों के काल में खेती की हालत बहुत गिर चुकी थी. किसानों का जमींदारी शोषण चरम पर था. उन्हें लगान चुकाना तक मुश्किल होता था. आजादी के बाद हमें सन् 60 के दशक से अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रपेलिया, बर्मा (म्यनमार) थाईलैंड से गेहूं व चावल आयात से अपनी जरूरत पूरी करनी पड़ती थी. मगर आज हालत इतनी सुधर गयी है कि भारत गेहूं व चावल का निर्यात करने लगा है. आज भारत सारे संसार में गेहूं व चावल उत्पादन में दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा राष्टï्र है. पहला राष्टï्र चीन इसलिये है कि उसका भूभाग व आबादी दोनों भारत से ज्यादा है. जहां तक प्रति एकड़ उत्पादन का सवाल है भारत चीन से भी आगे है. भारत और चीन दोनों की स्थिति है कि उनका उत्पादन और भारी आबादी से उसकी भारी खपत भी है. भारत कपास में भी चीन से नंबर दो है लेकिन चीन उसकी जरूरत के लिए भारत से कपास आयात करता है.

खाद्यान्न उत्पादन में हमारी एक बड़ी कमजोरी यह है कि खाद्य तेलों में 60 और दालों के उत्पादन में 40 प्रतिशत अपनी जरूरत से कम उत्पादन कर पा रहे हैं. शक्कर उत्पादन में ब्राजील प्रथम और भारत द्वितीय है. भारत का जीरा उत्पादन दुनिया के उत्पादन से 68 प्रतिशत है.

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