मोदी सरकार ने केंद्रीय कर्मचारियों के सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को मंजूर कर लिया और केंद्रीय कर्मचारियों को 1 जनवरी 2016 से इसका लाभ मिलने लगेगा. इस नये वेतमान से 48 लाख कर्मचारियों एवं 56 लाख पेंशनरों को लाभ मिलेगा. नये वेतनमान में न्यूनतम वेतन 18000 रुपये और मुख्य सचिव का अधिकतम वेतन 2.5 लाख रुपये होगा.

नये वेतनमान में जूनियर स्तर के कर्मचारियों के मूल वेतन में 14.7 प्रतिशत की वृद्धि होगी जबकि उच्च वेतन वाले अधिकारियों के वेतन में 23.5 प्रतिशत की वृद्धि होगी. वेतन वृद्धि 3 प्रतिशत वार्षिक ही रखा गया है जबकि ग्रेच्युटी 10 लाख से बढ़ाकर 20 लाख रुपये कर दी गयी है. इससे सरकार के खजाने में 1.02 लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ बढ़ेगा. यह देश के सकल घरेलू उत्पाद का मात्र 0.7 प्रतिशत होगा. भत्ते के संबंध में 4 माह में निर्णय लिया जायेगा.

इस वेतनमान से असंतुष्टï केंद्रीय कर्मचारियों के संघ ने 11 जुलाई को हड़ताल का आव्हान किया है. इस नये वेतनमान के संबंध में कुछ विचारणीय मुद्दे हैं जिनकी चर्चा इस आलेख में की गयी है. प्रथम वेतनमान में संशोधन का औचित्य, द्वितीय, क्या वेतनवृद्धि समानता एवं न्यायशीलता के सिद्धांत के अनुकूल है. तृतीय, अर्थव्यवस्था पर इसका वास्तविक भार कितना पड़ेगा? चतुर्थ, क्या इससे कर्मचारियों की कुशलता, दक्षता एवं कार्य के प्रति निष्ठïा एवं समर्पण में सुधार होगा? अंतिम, क्या भ्रष्टïाचार पर अंकुश लगेगा?

जहां तक वेतनमान में संशोधन का प्रश्न है? इसके औचित्य के दो कारण हैं- प्रथम, महंगाई भत्ता दिसंबर 2015 तक बढ़कर 119 प्रतिशत हो गयी है. अत: मूल वेतन में संशोधन आवश्यक हो गया था. द्वितीय 10 वर्षों में देश में कीमत सूचकांक का आधार बदपल जाता है. अत: 10 वर्षों में वेतनमान का समायोजन आवश्यक हो गया था. दूसरा प्रश्न- क्या वेतनवृद्धि समानता एवं न्यायशीलता के सिद्धांत को पूरा करता है. नये वेतनमान में छोटे कर्मचारी के मूल वेतन 7000 रुपये को बढ़ाकतर 18000 रुपये किया गया है. इस निचले स्तर के कर्मचारी को 31 दिसम्बर 2015 को कुल वेतन 7000+8330 रुपये (119 प्रतिशत महंगाई भत्ता) के साथ 15330 रुपये प्राप्त हो रहा है. अत: इसे वास्तविक लाभ 18000-15330-2670 रुपये होगा जो 17 प्रतिशत है.

इसके विपरीत, मुख्य सचिव का वेतन है 90000+107000 महंगाई भत्ता- 1,97,000 रुपये वास्तविक लाभ 250000-197000=53000 रुपये जो 27 प्रतिशत है. समानता एवं न्यायशीलता के सिद्धांत के अनुसार निचले स्तर के कर्मचारी को अधिक लाभ पहुंचाया जाना चाहिए किंतु नये वेतनमान में ऐसा नहीं है. यह प्रगतिशील न होकर प्रतिगामी है. इसके अतिरिक्त अधिकारी वर्ग को बंगला, मोटरकार, भत्ते एवं अन्य सुविधाएं प्राप्त होती हैं जबकि निचले स्तर के कर्मचारी इनसे वंचित हो हैं.

वेतनमान आय एवं धन की असमानता को बढ़ाएगा. तीसरे प्रश्न का संबंध है केंद्र सरकार ने 1.02 लाख करोड़ रुपये के अतिरिक्त भार का अनुमान लगाया है जबकि वास्तविक भार बढ़ेगा. राज्य सरकारों के कर्मचारियों का भी वेतन बढ़ेगा और इसका भुगतान भी केंद्र सरकार को सहायता अनुदान के रूप में वहन करना पड़ता है. प्रशासनिक व्यय में वृद्धि होने से सरकारें नयी नियुक्तियां नहीं करेंगी और सेवानिवृत्त कर्मचारियों की संविदा में नियुक्ति करके काम चलाएंगी अर्थात् संविदा नियुक्ति बंद नहीं होगी.

युवाओं की नयी नियुक्ति एवं रोजगार पर अंकुश लगेगा. दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि सेवानिवृत्ति के बाद कर्मचारी सक्षम एवं योग्य हैं तो उन्हें सेवानिवृत्त क्यों किया गया है? इससे प्रशासन में जी हुजूरी बढ़ेगी. चतुर्थ एवं पंचम मुद्दे एक दूसरे से जुड़े हुए हैं. वेतन 2.5 गुना हो जाने के बाद क्या कर्मचारियों की कुशलता, दक्षता, ईमानदारी, कार्यनिष्ठïा बढ़ेगी और भ्रष्टïाचार पर अंकुश लगेगा? इसका उत्तर है- नहीं प्रशासनिक व्यवस्था वहीं डाल के तीन पात के समान चलेगी. इसके विपरीत महंगाई बढ़ेगी, असंगठित क्षेत्र में कार्यरत् लोगों का कष्टï बढ़ेगा.

संक्षेप में नये वेतनमान से प्रशासनिक दक्षता, कर्मचारियों की कुशलता में कोई वृद्धि नहीं होगी. उद्योगपतियों, व्यापारियों, ठेकेदारों, रियल स्टेट कारोबारियों की पांचों उगंलियां घी में रहेंगी. आम आदमी असंगठित क्षेत्र में कार्यरत् लोगों का जीवन कष्टïमय होगा. यह समानता एवं न्यायशीलता के सिद्धांत के विरुद्ध भी है, क्योंकि इससे बड़े अधिकारियों को निचले स्तर के कर्मचारियों की तुलना में अधिक लाभ पहुंचाया गया है.

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