चीन की मुद्रा ‘युआन’ के अवमूल्यन से विश्व के तमाम शेयर बाजारों में तेजी से भावों का गिरना शुरू हो गया. इसके असर में भारत के शेयर बाजारों में भी सेनसेक्स तेजी से गिरता हुआ 1500 अंकों को पार कर और निफ्टी 470 अंकों तक गिरता गया और दोनों में यह गिरावट का रुख जारी रहा. रुपया की कीमत भी डालर के मुकाबले 64 पैसे और गिर गयी और इस समय रिकार्ड गिरावट में एक डालर भारत के 66 रुपये 52 पैसे के रेट पर चल रहा है.

रिजर्व बैंक के गवर्नर श्री रघुराम राजन ने फौरन ही प्रेस के सामने आकर कहा कि रुपये की कीमत को सम्हाला जा रहा है और यदि जरूरत हुई तो भारत उसके विदेशी मुद्रा भंडार से डालर को बेचेगा. भारत के विदेशी मुद्रा भंडार… में 400 अरब डालर मुद्रा मौजूद है. इसलिये भारत की अर्थव्यवस्था को झटके तो लग रहे हैं लेकिन उसका आर्थिक मूलभूत ढांचा (फंडामेंटल) बहुत मजबूत है. इस समय चीन के युआन के अवमूल्यन का निश्चित ही विपरीत असर पड़ रहा है. एक अरसे से चीन में मंदी का दौर आया हुआ है. उसका निर्यात काफी गिर गया है.

उसने सरकारी विदेशी मुद्रा भंडार से बैंकों को काम काज के लिये विदेशी मुद्रा उपलब्ध करायी है. चीन विश्व की दूसरी बड़ी अर्थव्यवस्था है और उससे मंदी का प्रभाव या विश्वव्यापी प्रभाव पडऩा ही है. यूरोपीय संघ और यूरो जोन के सबसे छोटे देश ग्रीस का दिवालिया स्तर पर डिफाल्टर होने से भी यूरोपीय बाजार अस्त-व्यस्त हो गया था. और उसका कुछ असर पूरे विश्व के व्यापार जगत पर पड़ा था. इस समय चीन के मुद्रा अवमूल्यन से वैश्विक अर्थव्यवस्था में मंदी (स्लो डाऊन) की स्थिति बन गयी है.

भारत के सामने एक और बड़ी आर्थिक समस्या आने की आशंका हो रही है. अमेरिका फेडरल रिजर्व बैंक देश में ब्याज की दरें बढ़ाने जा रहा है. इसका तुरंत ही यह प्रभाव होगा कि दुनिया के सभी बड़े निवेशक अपनी पूंजी अमेरिका में निवेश कर देंगे और विश्व बाजार में निवेश व पूंजी का अभाव हो जायेगा.
रिजर्व बैंक के गवर्नर श्री राजन ने इस संदर्भ में भारत के मजबूत मूलभूत (फंडामेंटल) ढांचा का उल्लेख किया है. उसका खुला अर्थ यही है कि भारत इतने बड़े भूभाग व जनसंख्या का देश है कि उसके हर उत्पाद की देश में ही इतनी खपत है कि उसका आर्थिक स्तर… बिखर नहीं सकता.

इन दिनों देश में प्याज का काफी अभाव है और मूल्य वृद्धि हो रही है. भारत ने तुरंत ही प्याज पर एक्सपोर्ट ड्यूटी बढ़ाकर उसका निर्यात कम कर दिया और देश में प्याज का अभाव दूर गया. ऐसी ही परिस्थितियों में भारत शक्कर, गेहूं आदि के निर्यात आयात कम करने या बढ़ाने के लिये कर लेता है और यही भारत का सबसे मजबूत आर्थिक मूलभूत आधार (फंडामेंटल) है. इसके विपरीत खाड़ी के पेट्रो क्रूड उत्पादक देशों में उनके क्रूड उत्पादन की इतनी खपत नहीं है कि वे उसका स्वयं का बाजार बन सके. इसी कारण अमेरिका ने सद्दाम के शासनकाल में इराक व अभी कुछ समय पहले तक ईरान के तेल पर खरीदी के अवरोध (सेगशन) लगाकर उनकी अर्थव्यवस्था को ध्वस्त कर दिया था. भारत की तरह दूसरे बड़े राष्टï्रों, चीन, रूस, अमेरिका में स्वयं के बाजार का बना होना उन्हें आर्थिक दृष्टिï से आत्मबल व आत्मविश्वास देता है. इस भारी उथल-पुथल में भारतीय अर्थव्यवस्था का घरेलू औद्योगिक उत्पादन क्षमता व उसका उपभोक्ता बाजार उसका मजबूत आधार है.

ऐसे में एक बड़ा संकेत यह आ गया है कि रिजर्व बैंक गवर्नर श्री राजन ने इंगित किया है कि बैंक अगली मौद्रिक समीक्षा में बैंक की दरों में कमी ला सकता है और साथ ही यह भी कहा है कि लंबे समय तक ग्रोथ और इन्फ्लेशन को डी-लिंक नहीं किया जा सकता.

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