राज्य सरकारों द्वारा शराबबंदी करना अलग बात है और उसे चला ले जाना अलग बात है. अभी हाल ही एक अप्रैल से मुख्यमंत्री श्री नीतेश कुमार ने पूरे बिहार राज्य में नशाबंदी लागू की है. कहा गया कि बिहार विधानसभा के चुनावों के समय उन्होंने राज्य की महिलाओं से वादा किया था कि वह शराबबंदी लागू करेंगे. ठीक ऐसा ही आंध्र में मुख्यमंत्री श्री एन.टी. रामाराव ने विधानसभा के चुनावों में महिलाओं से नशाबंदी का वादा किया था और जीतने पर राज्य में नशाबंदी लागू कर दी.

लेकिन उन्हें बड़ा कटु अनुभव हुआ और कुछ समय के बाद वहां नशाबंदी खत्म करना पड़ी थी. जिन शहरों-गांवों में नशाबंदी की मांग ज्यादा आयी थी वहां कच्ची शराब का धंधा बहुत तेजी से चला और उसमें महिलाएं भी बनाने बेचने में आगे रहती थीं. यह तक माना जाता है कि शराबबंदी वही चाहते है जो कच्ची अवैध शराब का धंधा चलाते है.

विधानसभा चुनाव के बाद हरियाणा में मुख्यमंत्री बंशीलाल और उससे भी पहले तमिलनाडु में मुख्यमंत्री श्री अन्ना दुराई ने भी शराबबंदी लागू की थी वहां भी कच्ची और जहरीली शराब इतनी तेजी से फैली कि इन राज्यों में शराबबंदी खत्म करनी पड़ी थी.

आजादी मिलने के बाद बाम्बे प्रेसीडेंसी जिसमें महाराष्टï्र-गुजरात एक राज्य के रूप में संयुक्त थे वहां नशाबंदी चली. अब महाराष्टï्र में शराबबंदी नहीं है. गुजरात में जब श्री शंकरसिंह बघेला मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने कहा कि गुजरात में इसलिए शराबबंदी है क्योंकि यह गांधीजी का राज्य है. लेकिन वास्तविकता यह भी है कि गुजरात भर में कच्ची और अवैध शराब हर जगह भरपूर चल रही है.
इस समय 3 राज्यों नागालैंड, मिजोरम व गुजरात में शराबबंदी है और अब उसमें चौथा बिहार जुड़ गया है. श्री नीतेश कुमार ने कहा है कि शराबबन्दी से राज्य सरकार को एक्साइज रेवेन्यू में 4000 करोड़ रुपयों का सालाना घाटा होगा, लेकिन रेवेन्यू निर्णय नहीं है.

इसमें आम आदमी जो नशे पर खर्च करता है वह उसे पूरे परिवार के भोजन, स्वास्थ्य, शिक्षा पर खर्च करेगा और घरों व गली-मोहल्ले में झगड़े व चोरियां लूट भी कम हो जायेगी. प्रारंभ के दिनों में जो बहुत ज्यादा शराबी हैं- उन्हें तकलीफ होगी उनके लिये नशामुक्ति केन्द्रों की व्यवस्था की है. जहां उनकी लत छुड़वाकर शराबमुक्त कराया जाएगा. श्री नीतेश कुमार पहले मुख्यमंत्री नहीं हैं- जो यह साहस कर रहे हैं. कामना तो यही है कि वह इसमें सफल हों और एन.टी. रामाराव, अन्ना दुराई, बंशीलाल की तरह असफल न हों.

आमतौर पर यह माना जाता है कि ईसाई और आदिवासियों में शराब सामाजिक चलन में है, लेकिन इन दिनों जहां बिहार से पहले से नशाबंदी लागू है और वे सफलता से चलाये भी जा रहे हैं- वहां नागालैंड और मिजोरम राज्य दोनों ही पूरी तौर पर ईसाई और आदिवासी बाहुल्य के हैं. करिश्मा तो वहां हो रहा है. बिहार को करके दिखाना चाहिए.

अभी बिहार के उन क्षेत्रों के लोग जहां दूसरे राज्यों व राष्ट्र- नेपाल, उत्तरप्रदेश, झारखंड, पश्चिम बंगाल से बिहार की सीमा मिलती है वहां के लोग शराब पीने इन राज्यों में जाने लगे हैं. दूसरे राज्यों में भी ऐसा हुआ. लेकिन पूरे बिहार के शराबियों के लिये यह संभव नहीं है कि वे दूसरे राज्यों में पीने के लिए जाएं. संविधान के निर्देशात्मक सिद्धान्तों पर सरकारों को जो निर्देश दिये गये हैं उनमें एक यह भी है कि वह शराबबंदी करेंगे.

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