radhakrishnanशिक्षक दिवस 5 सितम्बर की पृष्ठïभूमि में इस साल एक दिन पहले राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी और प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी स्वयं शिक्षक के रूप में सामने आये. राष्ट्रपति भवन परिसर स्थित डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद सर्वोदय स्कूल के 10वीं व 11वीं के छात्रों को भारत का राजनैतिक इतिहास स्कूल के क्लास रूम में जाकर टीचर सीट से पढ़ाया. इस अïवसर पर उन्होंने अपने अनुभवों को भी बताया कि स्कूल-कालेजों में बहुत मेधावी छात्र नहीं थे- औसत स्तर के विद्यार्र्थी थे. लेकिन जीवन में सामान्य ज्ञान व बुद्धि से लगातार प्रगति की जा सकती है. भारत के राजनैतिक इतिहास के संदर्भ में उन्होंने कहा कि संविधान का निर्माण भारत के राजनैतिक इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है. यह सबको बराबरी का अधिकार देता है. लोकतंत्र में चुनावों को पर्व की तरह हर्ष-उल्लास से मनाया जाना चाहिए.
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने जनरल मानेक शा सेन्टर से वीडियो कान्फ्रेन्सिंग के जरिये देश के छात्रों से सवाल-जवाब के रूप में संवाद किया. उन्होंने कहा कि अक्सर यह देखने में आ रहा है कि मां-बाप बच्चों पर उनके सपने थोपते हैं कि वह क्या बने. जबकि उन्हें अपने बच्चों का स्वभाव व रुचि का आंकलन करके उसे उसकी मर्जी की दिशा में जाने देना चाहिए.

यह भी एक असहज स्थिति है कि पिता आमतौर पर बच्चों की पढ़ाई से अनभिज्ञ बने रहते हैं और यह तय भी करते हैं कि वे डॉक्टर या इंजीनियर बनें. हर विषय व दिशा जो स्वभाव और रुचि के अनुकूल हो उसी दिशा में बढ़कर भी शीर्ष स्थिति और आत्म संतोष की स्थिति में पहुंचा जा सकता है. भारत में गुरु-शिष्य परम्परा बड़े ही उच्च स्थान पर स्थापित रही है. छात्र व शिक्षक के बीच में संवाद की स्थिति अवश्य रहनी चाहिए.
भारत के दूसरे राष्टï्रपति डॉक्टर राधाकृष्णन के जन्मदिवस को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है. वे उच्चतम पद पर रहने के बाद भी मूल रूप से अध्यापक ही रहे. अब शिक्षक दिवस को रस्मी तौर तक सीमित न रखा जाए बल्कि शिक्षक सम्मान को स्थापित किया जाए. भारत में अधिकार के रूप में ‘शिक्षा का अधिकारÓ दिया जा चुका है. यह सुनिश्चित करना ही होगा कि हर गाँव में स्कूल भवन हो और उसके साथ स्कूल के पास ही शिक्षकों व अन्य स्कूली स्टाफ के क्वार्टर भी बनाये जायेंगे. एक ओर शिक्षा को तो अधिकार के रूप में स्थाई विकास व्यवस्था बना रहे हैं और दूसरी ओर संविदा (कांट्रेक्ट) शिक्षक का वर्ग बना दिया है. शिक्षकों के विभिन्न वर्गों को खत्म करके स्कूल के आधार पर उनके वर्ग और वेतनमान निर्धारित किये जायें. उन्हें प्राइमरी-मिडिल शिक्षक, हाईस्कूल-हायर सेकेण्ड्री शिक्षक, महाविद्यालयीन शिक्षक और विश्व विद्यालयीन शिक्षक के रूप में वर्गीकृत किया जाए. उनके वेतनमान इतने उचित और आकर्षक हों कि योग्य व्यक्ति शिक्षक बनने के लिये आगे आये. शिक्षक और शिक्षा दोनों का आधार ही राष्ट्र के विकास को सुनिश्चित करेगा.