भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सी.ए.जी.) ने मध्यप्रदेश प्राइमरी व मिडिल शिक्षा की जिस दुर्दशा को बताया है- इसे देखते हुए तो मध्यप्रदेश के शिवराज सिंह चौहान को इस्तीफा दे देना चाहिएै. प्राइमरी व मिडिल शिक्षा ही आगे की शिक्षा की बुनियाद है.

उसके बारे में सी.ए.जी. ने कहा कि सरकारी स्कूलों के अधिकांश छात्र पढ़-लिख एवं शब्द पहचान नहीं सकते. राज्य में शिक्षा विभाग को 2010-16 में 7285 करोड़ रुपये कम दिये गये तब भी शिक्षा विभाग पूरे धन का उपयोग नहीं कर सका.

लगभग 11 लाख बच्चों ने 5वीं के बाद स्कूल छोड़ दिया और 5 लाख मिडिल के बाद ड्राप आऊट हो गए.राज्य के पांच लाख स्कूलों में एक भी शिक्षक नहीं हैं. केवल रिकार्ड में पांच लाख स्कूल हैं. इन्हें तो स्कूल माना ही नहीं जा सकता.

पूरे देश के साथ-साथ मध्यप्रदेश में भी ‘शिक्षा का अधिकार’ है. इसी अधिकार कानून के तहत राज्य में 2 लाख 20 हजार शिक्षकों की जरूरत हैं जबकि राज्य में 1 लाख 96 हजार शिक्षक ही पदस्थ हैं. सरकारी स्कूलों की दुर्दशा के कारण ही इन स्कूलों में प्रवेश लेने वाले छात्रों की संख्या में लगातार गिरावट आती जा रही है. यह संख्या 105 लाख 30 हजार से घटकर 78 लाख 96 हजार रह गयी है.

मध्यप्रदेश में तो सरकार ही शिक्षा के अधिकार कानून का उल्लंघन कर रही है. इस अधिकार की संवैधानिक मान्यता भी होती है. राज्य में सरकार ही छात्रों के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन कर रही है.

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