केन्द्र सरकार ने देश भर शिक्षा का अधिकार तो लागू कर दिया पर शिक्षा में सरकारी व्यवस्था व सरकारी कार्यवाहियों का भारी अभाव है.

सरकारी स्कूल बद से बदतर होते जा रहे हैं और नर्सरी से लेकर उच्चतम शिक्षा पर शिक्षा माफिया हावी हो चुका है. जब कुछ दुखद घट जाता है तो सरकारी अधिकारी व शासन कुछ दिनों के लिए सक्रिय हो जाता है और तमाम व्यवस्थाओं की बातें व घोषणायें होने लगती हैं और कुछ दिनों बाद वही सब अस्त-व्यस्त और उपेक्षित हो जाता है.

अभी इन्दौर में एक बड़े अखिल भारतीय निजी शिक्षण संस्थान डी.पी.एस. (दिल्ली पब्लिक स्कूल) की बस स्टेयरिंग फेल हो जाने की वजह से अनियंत्रित होकर एक ट्रक से जा भिड़ी. स्कूल बच्चे मारे गये, घायल हुए और ड्राइवर भी मारा गया.

उसके बाद सरकार तेजी दिखा रही है. जांच में पता चला है कि बस का मेन्टीनेंस ही नहीं था और ड्राइवर लगातार उसकी खामियां स्कूल प्रबंधन को बताता रहा था. उसमें स्पीड गवर्नर भी नहीं था और बस भी काफी तेज रफ्तार में थी. यह तो शासन की तरफ से पुलिस व ट्रान्सपोर्ट विभागों की जिम्मेवारी है कि वह यह सुनिश्चित करे कि बसों में स्पीड गवर्नर, इमरजेंसी गेट, पूरा रखरखाव सभी कुछ ठीक हो.

इंदौर की घटना के बाद भोपाल में भी स्कूली बसों की चेकिंग हो रही है. राजधानी में लगभग सवा सौ स्कूलों हैं जिसमें लगभग 2 हजार बसें हैं. जांच में इसमें 500 से ज्यादा बसें कंडम पायी गयीं और यह अभी तक चल रही थीं. इंदौर घटना के कारण ही यह सामने आया है. अभी तक शासकीय अमले ने पहले से खुद कुछ भी नहीं किया था.

स्कूलों में प्रबंधन ड्रेस, किताबें, स्टेशनरी आदि पर भारी मुनाफा व मोनोपोली चलाये हुये हैं. प्रकाशकों के जरिये नकली छपाई की पुस्तकों का काला धंधा भी कर रहे हैं.

मध्यप्रदेश में कई सरकारी स्कूल हैं ही नहीं बहुत कुछ बंद होते जा रहे हैं, कईयों में शिक्षक नहीं हैं. बिहार में कई ऐसे स्कूल हैं जो सरकारी अनुदान पा रहे हैं और वह कहीं भी नहीं है. केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री श्री प्रकाश जावड़ेकर ने हाल ही बताया कि ‘आधार कार्ड’ के आधार पर यह पता चला है कि कई निजी उच्च संस्थानों में 80,000 शिक्षक फर्जी पाये गये. कईयों की नौकरी एक ही समय में दो और दो से ज्यादा स्थानों पर दर्शायी गई है. कई उच्च शिक्षा संस्थानों में पर्याप्त मात्रा के प्रोफेसर नहीं हैं.

स्कूली शिक्षा में अभिभावकों से कहा जाता है कि अपनी समितियां बनाकर निजी स्कूलों के प्रबंधनों से मिलकर समस्या सुलझा लें. लेकिन शासन और अधिकारी स्तर पर शिक्षा को रेगूलेट करने के लिये जो कदम उठाने ही चाहिए, इस मामले में अधिकारी चुप बैठे रहते हैं.

शिक्षा, स्वास्थ्य व सड़क हर सरकार का जनहित का मुख्य काम होता है. लेकिन अब सरकारों का सबसे बड़ा काम टैक्स वसूलना रह गया है. सड़कें व पुल भी टोल टैक्स के जरिये किराये की सड़कें बना दी गई हैं. स्वास्थ्य संस्थाओं में भी निजीकरण बढ़ गया है और सरकारी अस्पताल निम्न श्रेणी के होते जा रहे हैं.केवल शिक्षा का अधिकार देने भर से काम नहीं चलेगा. प्राथमिक व मिडिल शिक्षा चाहे सरकारी या निजी क्षेत्र की हो शासन को उसे अपडेट करना ही होगा.

स्कूली बसों के अलावा निजी वाहनों, आटो, आपे में भी जरूरत से ज्यादा बच्चे भरे जाते हैं- वे लटक कर चलते हैं. यह पुलिस व सबकी निगाह में है. कभी कोई हादसा हो गया तो कुछ दिन की जांच-पड़ताल व कार्यवाही में ही सब सिमट जाता है.