मध्यप्रदेश में शिक्षा के क्षेत्र में सरकारी योजनाएं व घोषणाएं तो ऐसी की जाती हैं कि पूरी व्यवस्था चाक-चौबंद है, लेकिन वास्तविकता यह है कि स्कूल हैं तो शिक्षक नहीं हैं और शिक्षक हैं तो शाला भवन नहीं हैं. अभी शिक्षकों के हजारों पद खाली पड़े हैं. शिक्षा ऐसा किसी निर्माण प्रोजेक्ट का काम तो होता नहीं है, यह

स्थाई व्यवस्था है फिर भी संविदा शिक्षक और आंगनबाड़ी की शिक्षा में स्टाफ को गैर सरकारी मानना ऐसी बातें हैं जो यह बताती हैं कि सरकार की योजना और क्रियान्वयन में कहीं कोई तारतम्य नहीं है. इसलिए घोषणाएं भी सरकार का नारा बन के रह जाती हैं.

माध्यमिक शिक्षा मंडल के अधीन शासकीय स्कूलों का 2018-19 का शिक्षण सत्र 2 अप्रैल से शुरू होने जा रहा है इसमें छात्रों को सरकार की ओर से पाठ्य पुस्तक निगम की किताबें मुफ्त में दी जाती हैं, लेकिन अभी तक कोर्स की पुस्तकें स्कूल तक पहुंची नहीं हैं. ऐसा लगभग हर साल होता है.

शिक्षा सत्र तो शुरू हो जाता है लेकिन पाठ्य पुस्तकों के अभाव में शिक्षा प्रारंभ नहीं हो पाती है. इन मंडल के स्कूलों के अलावा सरकार के सीधे शिक्षा विभाग के स्कूलों की हालत इससे भी ज्यादा खराब है. वहां पाठ्य पुस्तक, शाला भवन और शिक्षक सभी कुछ गायब या अस्त-व्यस्त ही रहता है.

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