mp5उज्जैन,  आप सभी के भगीरथ प्रयासों से यह सिंहस्थ साकार होता दिखाई दे रहा है। यह प्रयास न केवल शिप्रा अपितु पूरे देश के लिए आदर्श प्रस्तुत करेगा। शिप्रा ग्लेशियर से निकली नदी नही है। यह तालाबों व वनस्पतियों से जीवन प्राप्त करती है। मेरी ऐसी कामना है कि माँ शिप्रा सदा नीरा रहे। आप सब मालवा की संवेदना की रक्षा कर रहे हैं।

ये बात जूनापीठाधीश्वर आचार्य महामण्डलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि जी महाराज ने मंगलवार को पंचमहाभूत सनातनी राष्ट्रीय विमर्श के समापन पर कही. 01 मई से प्रारंभ हुए इस राष्ट्रीय विमर्श में 100 से अधिक प्रतिष्ठित पर्यावरणविद, शोध विशेषज्ञ, सामाजिक कार्यकर्ताओं, वैज्ञानिकों, कार्पोरेट सेक्टर विशेषज्ञ एवं धर्म विज्ञान विशेषज्ञों द्वारा दृष्टि पत्र का निर्माण एवं पंचमहाभूत संतुलन घोषणा पत्र का अनुमोदन प्रस्तुत किया गया।

इस मौके पर शिप्रा संरक्षण का संकल्प भी लिया गया. पिछले सिंहस्थ में जल संसद में शिप्रा संरक्षण और उद्गम स्थल को जीवंत करने का संकल्प लिया था. आचार्यश्री ने इस सारस्वत अनुष्ठान और उसकी नाभिकीय सत्ता बने प्रो. रामराजेश मिश्र और उनकी टीम की प्रसंशा भी की।

प्रारंभ में डॉ. दिनेश जैन ने बताया सिंहस्थ 2004 में स्वामी जी की प्रेरणा से प्रो. मिश्र व उनकी टीम ने शिप्रा किनारे बसे गांवों में 500 सरोवरो का निर्माण तथा 50000 पौधों का रोपण और संरक्षण किया। प्रो. मिश्र ने पिछले घोषणापत्र का पालन प्रतिवेदन और नया संकल्प पत्र प्रस्तुत किया।

ये थे मौजूद…

स्वामी चिदानंद, महामंडलेश्वर स्वामी नैसर्गिका गिरि, नवभारत समूह संपादक क्रांति चतुर्वेदी, प्रो. हरीश व्यास, पं राधेश्याम मिश्र, प्रो देवेन्द्र मोहन कुमावत, प्रो. अलका व्यास, प्रो. नागेन्द्र शिंदे, प्रो. तपन चौरे, आचार्य अभय पाठक, प्रो शैलेन्द्र शर्मा, निगम चेयरमैन सोनू गहलोत आदि.

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