किसी प्रकार के विकास-औद्योगिक, व्यापारिक आर्थिक, सामाजिक या राजनैतिक विकास की पहली जरूरत ही यही है कि सबसे पहले उसके अनुरूप संरचना तैयार की जाए. अन्यथा आधारहीन वातावरण में यह भी देखने में आता है कि संरचना के अभाव में विकास के संसाधनों का ही विनाश हो जाता है.

सरकारी क्षेत्र के विकास में यह बहुधा देखने में आया कि करोड़ों की मशीन तो आ गयी लेकिन उनको चलाने संवारने वाले ऑपरेटरों व टेक्नीशियन के बारे में कोई तैयारी नहीं की गई. मशीनें किसी जगह ‘डम्पÓ कर दी गयीं और पड़े पड़े ‘जंकÓ हो गयी. विकास कुछ हुआ नहीं. जन-धन का विनाश जरूर हो गया.
निजी संस्थानों में तो ऐसा होना संभव नहीं होता इसीलिए निजी क्षेत्र की क्षमता व काम का तरीका सौ प्रतिशत रहता है. सरकारी क्षेत्र की अवनति व असफलता का एक बड़ा कारण राजनेताओं व अफसरशाही द्वारा सरकारी उपक्रमों को, व्यपारिक संस्थानों को दफ्तरों की तरह चलाया गया. उदाहरण के लिये देश में आजादी के बाद जनचेतना बढ़ी और ‘हाथ घड़ीÓ उसका प्रतीक बनी. देश में घड़ी बनती नहीं थी तो भारी मात्रा में स्विस घडिय़ों की तस्करी होने लगी. प्रधानमंत्री पंडित नेहरू जब इस अजीबोगरीब तस्करी और लोगों की जरूरत से अवगत हुए तो उन्होंने अपने एक भरोसे के अफसर श्री मुथैया को यह दायित्व सौंपा कि विश्व में घडिय़ों के देश स्विट्जरलैंड की स्विस घडिय़ों के मुकाबले जापान की एक फर्म से करार कर भारत में हाथ घड़ी बनाये. श्री मुथैया ने एचएमटी घड़ी बनाई जो न सिर्फ भारत बल्कि दुनिया में श्रेष्ठ घडिय़ों में मानी गयी और घडिय़ों के अभाव वाला देश भारत उस समय एच.एम.टी. घडिय़ों का निर्यात करने लगा. लेकिन श्री मुथैया के बाद दूसरा उस प्रतिभा का अफसर नहीं आया. काफी समय टाटा की ‘टाइटनÓ घड़ी बाजार पर छा गयी और एच.एम.टी. चलना तो ‘बन्दÓ नहीं हुई लेकिन बिकना ‘बन्दÓ हो गयी. आज वह खत्म हो गयी है.

भारत निजी निवेश, निजी उद्योग के साथ विदेशी निवेश व उद्योग की तरफ बढ़ रहा है. भारतीय उद्योगपतियों ने भी विदेशों में जाकर टाटा ने ब्राजील में सबसे बड़ा स्टील प्लांट ‘कोटसÓ और फोर्ड कार ब्रैंड जगुआर व लेंड रोवर खरीद लिये. निवेश व औद्योगिकीकरण के निजी निवेश वातावरण में सरकारी अफसरों की रिपोर्टों से ज्यादा व्यापारिक व उद्योग संगठनों के अध्ययनों को भी उतना ही महत्व देना चाहिए.

एसोचेम (ऐसोसियेटिड चेम्बर) ने अर्थव्यवस्था, ऊर्जा, सड़कों व स्वास्थ्य के आधार पर राज्यों की स्थिति का अध्ययन किया है. उन्होंने पाया कि केवल दो राज्य तमिलनाडु व केरल ही इन क्षेत्रों में ठीक चल रहे हैं. वैसे शिक्षा के क्षेत्र में तमिलनाडु भी काफी पीछे है. केरल में संतुलित विकास हुआ है. गुजरात, आंध, ्रबिहार और पश्चिम बंगाल भी अच्छे चल रहे हैं. उसके बाद उत्तरप्रदेश, हरियाणा, महाराष्टï्र और ओड़ीसा का विकास आंका गया.

मध्यप्रदेश में औद्योगिक विकास का कार्य उत्तम रहा लेकिन वह आमदनी व समानता के पक्षों…..में पीछे है. मध्यप्रदेश सड़कों के विकास में अभी उच्च स्तर में नहीं पहुंचा है.

निवेश और उद्योग को जमाने के लिए सबसे जरूरी संरचना की उपलब्धता सरकार को ही करनी है. यदि यह अफसरशाही की लेतलाली या भूमि अधिग्रहण की राजनीति में उलझता रहा तो विकास के सब सपने केवल सपने ही रह जायेंगे. सरकार को केवल संरचना ही जमा कर देनी है बाकी सब निजी क्षेत्र अपने निवेश से हासिल कर लेगा और यह तभी संभव होगा जब उसका काम शुरू हो जाए.

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