भारत में संसद व विधानसभाओंकी प्रणाली चलेगी या नहीं अब यह प्रश्न राष्ट्र के समक्ष उपस्थित हो गया है. साथ ही यह भी जानना जरूरी हो गया है कि उस हालत की संवैधानिक व्यवस्था कैसी होगी और किस तरह चलेगी.

अभी तक संसार में कई प्रजातंत्रीय देशों में यह तो होता है कि सत्ता पर फौजों ने कब्जा कर लिया. उस देश की संसदीय प्रणाली खत्म कर दी गयी. संविधान रद्द हो गया और वहां मार्शल लॉ से फौजी शासन हो गया. पड़ोसी देश पाकिस्तान और म्यनमार में फौजी तख्ता पलट हो चुके हैं.

एक ओर पड़ोसी राष्ट्र नेपाल में प्रजातंत्रीय सरकार पर फौजों ने तो कब्जा नहीं किया था. लेकिन वहां राजतंत्रीय व्यवस्था में नेपाल नरेश महाराजा महेंद्र ने वी.पी. कोयराला सरकार को सत्ता से हटा कर संविधान को रद्द कर दिया और राजतंत्रीय शासन कायम किया था.

संसद की कार्यप्रणाली उसकी नियमावली से चलती है. लोकसभा स्पीकर व राज्यसभा के सभापति का दायित्व सदन को उस नियमावली के आधार पर चलाना होता है. नियमों में यह प्रावधान है कि सदस्य केवल अपने स्थान से ही बोलेंगे, स्पीकर या सभापति की अनुमति से ही बोंलेगे और सदन में किसी तरह का प्रदर्शन नहीं होगा.

स्पीकर व सभापति संसद के अधिकारियों व स्टाफ के तो सर्वोच्च अफसर हैं लेकिन सदन में ये दोनों सांसदों के ऊपर अधिकारी नहीं होते हैं. अगर किसी सदस्य की छुट्टी भी मंजूर करना है तो सदन की अनुमति ली जाती है.

इन दिनों यूपीए के शासनकाल में जब कांग्रेस सत्ता में थी और भारतीय जनता पार्टी विपक्ष में थी उस समय से कई सदस्य खासकर विपक्ष के सदस्य नियमों का उल्लंघन व उपेक्षा कर सदन में कहीं से भी, स्पीकर के सामने खड़े होकर बोलते हैं. स्पीकर की अनुमति के बिना बोलते हैं और सदन में नारे व धरनों से प्रदर्शन भी होते हैं.

इसके चलते यूपीए काल में अब तक एनडीए भाजपा के मोदी काल तक यही हो रहा है और संसद ठप्प हो जाती है. बात यहां तक आ पहुंची है यूपीए के शासन काल में विपक्ष में बैठी भारतीय जनता पार्टी ने स्पेक्ट्रम पर जे.पी.सी. की मांग पर पूरा मानसून सत्र ही नहीं चलने दिया. देश में सभी को यह चिंता व्याप्त है कि यदि संसद में ऐसे ही अवरोध जम व स्थायी हो गये तो संसद और देश कैसे चलेगा?

अब भारतीय जनता पार्टी सत्ता में है और विपक्ष में कांग्रेस के अलावा कई अन्य छोटे दल- अन्ना द्रमुक, तेलगूदेशम आदि भी हैं.

अभी हाल में जो बजट सत्र चला उसमेें संसद की दुर्गति चरम सीमा पर पहुंच गई. विपक्ष के हंगामों व अवरोधों में बजट ही बिना चर्चा के (ग्लोटीन) पास हो गया.

विपक्ष के कुछ दल सरकार के विरुद्ध अविश्वास का प्रस्ताव ले आये, लेकिन विपक्ष की ही दो छोटी पार्टियों तमिलनाडु की अन्ना द्रमुक कावेरी के मसले पर और आंध्र की तेलगू देशम पार्टी राज्य को विशेष दर्जा की समस्या व मांग पर सदन में लगातार हंगामा व प्रदर्शन करती रहीं और अविश्वास चर्चा के लिए स्वीकृत किये जाने की भी स्थिति में नहीं आ पाया और संसद का बजट सत्र समाप्त हो गया. अब यह स्थिति बनती जा रही है कि संसद के सत्र समाप्त नहीं हो रहे बल्कि संसद ही समाप्त होती जा रही है.

देश का राष्टï्रपति व राज्यों के राज्यपाल संवैधानिक पद हैं और वे पद ग्रहण पर संविधान की रक्षा व उसे अक्षुण्ण रखने की शपथ लेते हैं.

संसद व विधानसभाएं जो संवैधानिक संस्थाएं हैं- काम नहीं कर पा रही हैं तब यह राष्ट्रपति व राज्यपालों का संवैधानिक दायित्व हो जाता है कि राष्ट्रपति राज्यपालों का सम्मेलन बुलाकर इस स्थिति का निदान करें कि संसद व विधानसभाओं को नियमावलियों के अनुसार कैसे चलाया जाए.

राष्ट्रपति को सुप्रीम कोर्ट को भी यह रिफरेंस करना चाहिए कि जब संसद व विधानसभायें गतिरोधों में काम ही नहीं कर पा रही हंै उस हालत में संविधान में क्या व्यवस्था है कि राष्ट्रपति या राज्यपाल उन्हें संचालित करने के क्या अधिकार रखते हैं.

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