69वें स्वाधीनता दिवस को जहां देश के राष्टï्रपति श्री प्रणव मुखर्जी संसद के अवमूल्यन पर अपनी चिंता व व्यथा व्यक्त कर रहे थे, उसी अवसर पर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी लाल किले की प्राचीर से देश के प्रगति के सोपानों का उल्लेख कर रहे थे. इससे पहले कभी भी राष्टï्रपति और प्रधानमंत्री के भाषणों व मूल्यांकन में इतना भारी विरोधाभास नहीं
देखा गया.

संसदीय व्यवस्था व प्रजातंत्र की स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि राष्टï्रपति को अपने राष्टï्र के नाम उद्बोधन में यह कहना पड़ा कि अभी नहीं चेते तो आने वाली पीढ़ी हमें सम्मान से याद नहीं करेगी. संसदीय अवमूल्यन पर देश के सभी राजनैतिक दल इस भयंकर अपराध के दोषी है कि देश संसद अखाड़ा बन गयी है. इस अखाड़ेबाजी से किसी भी पक्ष की जीत-हार तो नहीं दिखती है लेकिन ‘प्रजातंत्रÓ जरूर ‘भीड़तंत्रÓ से हार जायेगा. प्रश्न यह है कि यदि इस देश में प्रजातंत्र और संसदीय प्रणाली नहीं चली तो उस स्थिति में देश में कौन सी व्यवस्था चलेगी. क्या भारत की अभी तक इन लगभग 70 सालों में जो भी प्रगति हुई है वह खत्म होगी और देश में ‘अराजकताÓ हो जायेगी. इन 70 वर्षों का यह भी एक बहुत अध्याय है कि देश में वास्तविक प्रगति से कहीं ज्यादा प्रगति भ्रष्टाचार में हुई है. प्रधानमंत्री राजीव गांधी को यह स्वीकार करना पड़ा, कि एक रुपये में से मात्र 15 पैसे ही विकास में लगते हैं बाकि 85 पैसे प्रशासनिक व्यवस्था व भ्रष्टïाचार पर खर्च होते हैं. भ्रष्टïाचार में प्रगति को देश की दुर्गति ही कहा जायेगा.

भाषा की व्याख्या में संसद व विधानसभाएं ‘वाद-विवादÓ का मंच है जिसका अर्थ होता है कि विचारों पर बौद्धिक स्तर का विचार विमर्श हो. लेकिन अब संसदीय प्रणाली के वर्तमान में अवमू्ल्यन या ‘वादÓ शब्द तो गायब हो गया और केवल ‘विवादÓ ही हो रहा है. राष्टï्रपति के शब्दों में अब संसद परिचर्चा की बजाय टकराव के अखाड़े में बदल गयी. राजनैतिक दलों एवं जनता को इस पर गंभीर चिन्तन कर कोई उपाय ढूंढना होगा. लोकतंत्र की हमारी संस्थाएंं दबाव में है. इस गंभीर स्थिति पर न सिर्फ नेताओं बल्कि आम जनता दोनों को अब कुछ करना ही होगा. भारत का संविधान लोकतंत्र को अमूल्य उपहार है. हमारा लोकतंत्र रचनात्मक है. इसका निर्वहन सहिष्णुता और धैर्य के साथ किया जाना चाहिये.
यह भी एक अजीब विडम्बना है कि संसद जहां कानून बनाना उसका मुख्य कार्य है वहीं कई विधेयक जिन्हें अब तक कानून बनकर देश की व्यवस्था व प्रशासन में आ जाना था वह इसलिए लंबित पड़े हैं और उसकी संख्या बढ़ती ही जा रही है- क्योंकि संसद हंगामे व हुल्लड़ में लगातार ऐसी स्थगित हो रही है कि पूरा सत्र ही अखाड़ेबाजी में खत्म हो जाता है.

इस बार पक्ष-विपक्ष में कुछ ऐसी स्थिति बनी है कि भाजपा (एनडीए) जो इस समय सत्ता में है वह इससे पहले 10 सालों तक विपक्ष में थी और उस समय कांग्रेस (यूपीए) में सत्ता में थी. उस समय भाजपा ने यूपीए सरकार के खिलाफ यही सब कुछ किया था जो आज उसके विरुद्ध कांग्रेस विपक्ष में बैठी कर रही है. कहा भी यह जा रहा है कि उस वक्त आपने जो हमारे खिलाफ किया था अब वही हम आपके खिलाफ कर रहे हैं. यह एक ‘चेनÓ बन गयी है जो इस तरह सत्ता परिवर्तन में इधर से उधर चलती ही जायेगी. इसका एकमात्र निदान यही है कि इस ‘चेनÓ को तोड़ा जाए कि आगे ऐसा आचरण संसद व विधानसभाओं में कभी कोई नहीं करेगा. वरना यह ‘चेनÓ संसदीय प्रणाली को चेन (जंजीर) में जकड़कर मार देगी. राष्टï्रपति पर भी संविधान की प्रक्रियाओं व भावनाओं के अनुसार संचालन का संवैधानिक दायित्व है. अब राष्टï्रपति को ही इस मामले में सक्रिय होना पड़ेगा.

उन्हें संविधान में यह अधिकार है कि संसद को ‘संदेशÓ (मैसेज) भेज सकते हैं. उन्होंने इस बार स्वतंत्रता दिवस पर जो कहा है उसे विस्तारित रूप में संदेश के रूप में संसद को भेजे और संसद को उस पर विचार करना ही होगा.