प्रवेश कुमार मिश्र

नई दिल्ली,

कांग्रेस पार्टी में बहुत कुछ बदलने लगा है. नवनिर्वाचित अध्यक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व में पार्टी न सिर्फ नई उर्जा के साथ आगे बढऩे को तैयार है बल्कि भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए भी पार्टी योजनाबद्ध तरीके से आगे बढ़ रही है.

इसकी बानगी गुजरात चुनाव परिणाम के बाद आरंभ हुई आत्ममंथन से मिलने लगी है. पहले के तर्ज पर हार की समीक्षा के लिए उच्चस्तरीय कमेटियों की गठन करने की प्रथा से एकदम अलग पार्टी ने तत्काल मौका पर पहुंचकर समीक्षा की नई चलन आरंभ कर दी है.

इतना ही नहीं कमियों के लिए एक दूसरे पर आरोप मढऩे की परंपरा भी अब समाप्ति की ओर है. नेता खुद आगे बढ़कर हार की जिम्मेदारी ले रहा है और स्वयं समीक्षा का हिस्सा बन रहा है.

राजनीतिक जानकार मान रहे हैं कि बदलते राजनीतिक मिजाज को भांप कर जिस अंदाज में कांगे्रस आगे बढ़ रही है उससे साफ है कि वह समय के साथ कदम ताल करने को तैयार हो गई है. हालांकि ऐसा नहीं है कि वह अपनी परंपरागत राजनीतिक पूंजी व मार्गदर्शन से विमुख होकर बढऩे की तैयारी में है.

बल्कि वह उसी विरासत से धैर्य व शालीन राजनीति को आत्मसात कर विपक्षी राजनीति को मात देने के लिए कमर कस चुकी है. क्योंकि राहुल गांधी ने अपने प्रथम अध्यक्षीय भाषण में जिस मर्यादा की बात की, वह स्वभाविक तौर पर कांग्रेसी विरासत की देन है.

इतना ही नहीं गुजरात व हिमाचल चुनाव में प्रयोग किए गए विपक्षी शब्दावली से इतर राहुल गांधी ने न सिर्फ आचार व्यवहार में मर्यादा का प्रमाण दिया बल्कि भाषाई लड़ाई में भी बेरूखी नहीं दिखाई.

साथ ही पार्टी में जिसने मार्यदा को लांघने का प्रयास किया उसे बाहर का रास्ता दिखाया. जो यह प्रमाणित करने के लिए काफी है कि राजनीति के नए दौर में आरंभ हुई भाषाई जंग में भी कांग्रेस अपने को भीड़ से अलग रखे हुए है.

पार्टी के एक वरिष्ठ नेता की माने तो सांगठनिक स्तर निर्णय में अब तेजी आ गई है. संचार के बदलते दौर में विपक्ष से मुकाबला करने के लिए बहुस्तरीय टीम बनाई जा रही है. जनवरी के अंत तक राहुल गांधी अपनी टीम को गठित कर सकते हैं तथा जल्द ही कई राज्यों के अध्यक्ष बदलने के निर्णय पर अंतिम मुहर लग सकती है. यानी पार्टी के कार्य पद्धति में न सिर्फ बदलाव हो रहा है बल्कि निर्णय में भी तेजी आई है.

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