प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लालकिले की प्राचीर से दूसरी बार तिंरगा फहराते हुए भारत के विकास के लिए 2022 को लक्ष्य रखकर अपने भाषण में अनेक योजनाओं का भी उल्लेख किया है. प्रधानमंत्री ने इस बार फिर लक्ष्य रखा – सक्षम, स्वस्थ, श्रेष्ठ, स्वाभिमानी, सम्पन्न और स्वावलंबी भारत का निर्माण. अपने सपनों में मोदी ने समाज के गरीब, कृषक, दलित और आदिवासी तबके के विकास पर भी जोर देने की कोशिश की है. ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी विकास के लिए जरूरी है कि देश का हर गांव बिजली की सुविधाओं से सुसज्जित रहे.

18500 गांव अभी भी ऐसे हैं जहां बिजली का खंभा नहीं लगा है. नरेंद्र मोदी ने यह अहम घोषणा की है कि आगामी एक हजार दिवस के भीतर हर गांव में बिजली पहुंचा दी जाएगी. गांव में यदि लगभग तीन साल के भीतर इस तरह से बिजली पहुंचती है तो ग्रामीण भारत के एक बड़े हिस्से को अंधेरे से मुक्ति मिल जाएगी.
आदिवासी और दलित समाज की ओर लक्ष्य करतेे हुए प्रधानमंत्री ने अहम घोषणा की कि देश की सवा लाख बैंक शाखाएं कम से कम एक-एक दलित व्यक्ति को स्टार्ट-अप लोन दे तो इन समाजों के उन्नयन के लिए यह एक पहल होगी.

दलित समाज के लिए इस तरह के लोन के साथ-साथ विकास की समग्र रणनीति भी तैयार करना होगी. इसमें उनके उत्पादों को बेहतर मार्केट उपलब्ध कराना भी शामिल होगा. कुछ सालों पहले देश शहरी और ग्रामीण गरीबों को दो योजनाओं- स्टेप-अप और आईआरडीपी का हश्र देख चुका है. लक्ष्यपूर्ति की अंधी दौड़ में आंकड़ों में सफलता हासिल होती गई थी, लेकिन वास्तविक जीवन में गरीब वर्ग आर्थिक चक्रव्यूह में उलझता चला गया था. दलितों और आदिवासियों के विकास की इस योजना को और विस्तारित होना चाहिए, लेकिन इसके क्रियान्वयन पर सख्त मॉनीटरिंग की भी जरूरत रहेगी.

युवाओं को रोजगार के और अवसर बढ़ाने की दिशा में यह घोषणा की गई है कि ज्यादा लोगों को रोजगार मुहैया कराने वाली कंपनियों को अलग से पैकेज दिया जाएगा. यह सराहनीय कदम है, लेकिन देश में बढ़ती बेरोजगारों की फौज के सामने अकेले यह प्रयास नाकाफी रहेंगे. बेरोजगारी को दूर करने के लिये और भी योजनाओं, रणनीति पर विचार किया जाना जरूरी है. प्रधानमंत्री ने एक विचार यह भी रखा है कि छोटी नौकरियों में इन्टरव्यू की बाध्यता समाप्त कर मार्कशीट के आधार पर नौकरियां मुहैया कराई जाए. यह पहल भी स्वागतयोग्य है लेकिन इस बात की मानीटरिंग रखना बहुत जरूरी है कि हर तरह की पवित्रता-परीक्षा के हर स्तर पर कायम रखी जाए. अन्यथा व्यापमं जैसे घोटालों ने हमारे सिस्टम की पोल खोलकर रख दी है. हम एक रास्ते में भ्रष्टïाचार को हटाना चाहते है तो वह दूसरे रास्ते से आकर हमारे मकसदों को ग्रहण लगा देता है. इस पर भी समग्र सोच की जरूरत है.

प्रधानमंत्री ने कानूनों के विस्तार के बजाए उन्हें और सरल बनाने पर जोर दिया. इससे न्यायपालिका पर अनावश्यक बोझ बढ़ता है. हम इन सबसे बचेंगे. यह अच्छा सोच है. हमारी कार्यप्रणाली अनावश्यक उलझनों से बचेगी. प्रधानमंत्री ने सांप्रदायिकता के जहर को विकास के अमृत से समाप्त करने की बात कही है. अकेले सांप्रदायिकता ही नहीं- आंतरिक आतंकवाद और नक्सलवाद भी इस समय देश के सामने एक नई चुनौती बनकर सामने आ रहा है. उनसे निपटने के लिये भी एक विशेष रणनीति की जरूरत है. नक्सलवाद की चपेट में अभी देश के अनेक हिस्से हैं. आए दिन अनेक लोग काल के मुंह में समा जाते है. सिस्टम नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में काम नहीं कर पा रहा है.

इन मुद्दों पर भी समग्र सोच की जरूरत है. प्रधानमंत्री ने किसानों की समस्याएं समाप्त करने की बात कहते हुए घोषणा की कि कृषि मंत्रालय का नाम बदलकर किसान कल्याण मंत्रालय रखा जाएगा. दरअसल भारत का किसान समाज अनेकानेक समस्याओं से जूझ रहा है. अनेक राज्य इसलिए चर्चित है कि वहां परेशान किसान मौत को गले लगा रहे हैं. महात्मा गांधी ने इस देश की विकास की अवधारणा का मूल नारा दिया था कि भारत गांवों का देश है. हमने ग्रामीण विकास का ख्याल रख लिया तो यह समझो हमने देश के विकास की एक बड़ी लड़ाई जीत ली है. किसान समाज इसी विकास की आत्मा है.

अन्नदाता किसानों के विकास के लिए केवल मंत्रालय का नाम बदलने से कुछ विशेष हासिल नहीं होगा. देश को एक ऐसा आत्मनिर्भर बाजार चाहिए जो यहां के किसानों और खरीददार आम नागरिकों दोनों के हितों की चिन्ता कर सके. किसानों की फसलें इसके केंद्र में रहे. ऐसी तमाम किसान हितैषी नीतियों की अभी भी इस देश को आवश्यकता है. इन अच्छी नीतियों का ठीक क्रियान्वयन हो, यह भी जरूरी हो गया है. कृषि के क्षेत्र में अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है.
हर 15 अगस्त पर लालकिले की प्राचीर से देश के विकास का नया दृष्टिïकोण रखना- हमारी परम्पराओं का एक हिस्सा रहा है. आजादी के बाद कमोबेश हर प्रधानमंत्री ने लालकिले से देश के विकास के अपने सपनों को जनमानस के साथ साझा किया है.

यदि प्रारम्भ से लगाकर अभी तक सभी सपनों का क्रियान्वयन हो जाता तो शायद हम अभी प्रगति के न जानें कितने आयाम पार कर लेते. लेकिन प्रधानमंत्री जब अपने सपने साझा करते हैं, तो राष्ट्र विकास के क्षेत्र में आशा और विश्वास का एक नया वातावरण तैयार होता है. यह आगे बढऩे के लिए नितांत जरूरी है. हम इन्हीं सपनों के सहारे आजादी के बाद निरन्तर प्रगति-पथ की ओर अग्रसर भी हैं. उदाहरण के तौर पर पिछले साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वच्छ भारत का सपना दिया था. एक सोच विकसित हुआ.

वातावरण भी बना. कुछ जागृति भी आयी, लेकिन क्रियान्वयन के तौर पर स्थानीय निकाय संस्थाओं को अभी इस दिशा में बहुत कुछ करना बाकी है. कुछ और उदाहरण भी हमारे सामने हैं. आदर्श ग्राम योजना में अभी तक सौ सांसदों ने कोई रुचि ही नहीं दिखाई. यह प्रधानमंत्री के सपनों के क्रियान्वयन के साथ कैसी विडम्बना है? स्किल इंडिया योजना पर मंथर गति से काम चल रहा है? स्कूलों में टॉयलेट बनाने की दिशा में हम 45 फीसदी ही आगे बढ़ सके हैं. पेट्रोल-डीजल जरूर महंगा-सस्ता होता रहता है, लेकिन समग्र महंगाई तो बढ़ रही है? प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का हर सपना बेहतर है. हमें विकास की ओर ले जाता है. लेकिन उसका क्रियान्वयन किस दिशा, किस गति के साथ हो रहा है- इस यथार्थ पर हर क्रियान्वयन एजेंसी को नजर रखनी पड़ेगी. तभी सब कुछ अच्छा
हो पाएगा.

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