यूरोपीय राष्ट्र ग्रीस के आर्थिक संकट ने उस राष्टï्र को हिलाकर और सभी राष्टï्रों को चेता दिया कि सरकारी खर्चें दायरे से बाहर जाने और हैसियत से ज्यादा देशी या विदेशी कर्ज लेने से कोई राष्टï्र दिवालिया हो सकता है. ग्रीस यूरोपीय यूनियन का सदस्य है और यूरो मुद्रा का देश है. उसने अपने देश में ओलंपिक खेलों का आयोजन कर भारी खर्च कर डाला और आर्थिक दशा बिगडऩे पर विश्व बैंक और अंतरराष्टï्रीय मुद्रा कोष से भी कर्जा लिया. ओलंपिक खेलों के बड़े खर्चों के काम कंपनियों से कराये गये कामों का उनके ठेकेदारों का आज तक भुगतान नहीं कर पाया. वह विश्व बैंक व अंतरराष्टï्रीय मुद्रा कोष का डिफाल्टर राष्टï्र घोषित हो चुका है. यूरोपीय यूनियन के देशों से उसे वित्तीय मदद भी इन कठोर शर्तों पर पहुंचायी कि वह अपने सरकारी खर्चें कम करेगा और टैक्स की दरें बढ़ा के आमदनी बढ़ायेगा. उसको यह चेतावनी भी दी गयी कि यदि उसने यूरोपीय यूनियन के निर्देशों व शर्तों को नहीं माना तो उसे यूरोपीय यूनियन से निकाल दिया जायेगा और यूरो मुद्रा से भी हटा दिया जायेगा.

भारत ने ग्रीस के संकट को ध्यान में रखकर अपना वित्तीय प्रबंधन सुधारना प्रारंभ कर दिया है. केन्द्र सरकार का इन दिनों सबसे ज्यादा ध्यान चालू खाता में वित्तीय घाटा (फिसकल डेफीशिट) को 3-4 प्रतिशत की सीमा में रखने में लगा है. केन्द्रीय वित्त मंत्री श्री अरुण जेटली ने देश की सभी राज्य सरकारों को आगाह किया है कि वे अपने सरकारी खर्चे को दायरे में लायें वरना ग्रीस जैसे हालात हो सकते हैं. अब भारत में अपने यहां मनाये जाने वाले ‘दिवसोंÓ में भारतीय लेखा दिवस मनाना भी शुरू कर दिया है. 10 अगस्त 2015 को पहला लेखा दिवस मनाया गया. श्री जेटली ने कहा कि आज की दुनिया में सभी राष्टï्र व उसकी सरकारें और विश्व व्यापार एक-दूसरे से जुड़ी है.

ग्रीस के वित्तीय संकट ने पूरे यूरोपीय संघ के साथ-साथ सारी दुनिया के व्यापार व वित्तीय आधार को झकझोर दिया था. भारत की महंगाई व अर्थव्यवस्था पर भी उसका कुछ असर हुआ था. उसका निर्यात व्यापार काफी प्रभावित हुआ था.
आज भारत की आर्थिक व वित्तीय प्रबंधन में सबसे बड़ा वित्तीय संकट शासकीय भ्रष्टïाचार में सरकारी धन की काफी बरबादी हो रही है. इसके साथ ही सारे विश्व में आतंक की स्थिति होने से सभी राष्टï्रों पर आतंक के विरुद्ध सुरक्षा व्यवस्था पर इतना खर्च करना पड़ रहा है कि उनकी फौजों पर खर्चों से भी बहुत ज्यादा है. इसके साथ ही अब अपराध (क्राइम) भी व्यक्तिगत न रहकर सामूहिक संगठित व्यवसाय का रूप ले चुके हैं. चाहे वह रेत व अन्य खनिज की चोरी हो जो अब चोरी न होकर खुली डकैती हो गयी है या कि बैंकों और उसकी एटीएम को लूटना है.
जब दुनिया में आतंक की लहर चली है वह नक्सल, लिट्टïे, लश्करे तैयबा जैसे रूपों में फौजी रूप ले चुके हैं. राष्टï्रों के बीच युद्ध तो कभी कुछ दिनों का होता है लेकिन आतंक सतत् चलता जा रहा है. कभी भी कहीं कोई घटना हो जाती है. इसके प्रतिकार के लिये राष्टï्रों को सतत् भारी सुरक्षा की अद्र्धसैनिक (पेरामिलीट्री) को बनाये रखना पड़ता है. एक अंतरराष्टï्रीय अध्ययन में यह प्रकट हुआ है कि आतंक एक सतत् चलने वाला क्षदम्य युद्ध बन चुका है और यह राष्टï्रों का सबसे बड़ा खर्च है. दुनिया की आर्थिक प्रगति में यह सबसे बड़ी बाधा है.
भारत में भ्रष्टïाचार व आतंक पर सबसे ज्यादा वित्तीय हानि व खर्च हो रहा है. वित्तीय सुदृढ़ता (फिसकल कन्सोलीडेशन) के लिये सबसे ज्यादा जरूरी यह हो गया है कि भ्रष्टïाचार और आतंक दोनों को जड़ से मिटाया जाए.

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