संसद सदस्यों की पेंशन समाप्त करने को लेकर एक जनहित याचिका सर्वोच्च न्यायालय में प्रस्तुत की गई है. सर्वोच्च न्यायालय ने इस याचिका को विचारार्थ स्वीकार करते हुए, भारत सरकार से उसकी राय मांगी है औरउत्तर देने को कहा है.

सरकार की ओर से क्या उत्तर आयेगा इसके संकेत इस बात से मिल जाते हैं कि वित्त मंत्री अरुण जेटली ने संसद सदस्यों के द्वारा पेंशन के पक्ष में मांग और टिप्पणियों के उत्तर में कहा कि सांसदों की पेंशन, वेतन आदि तय करने का अधिकार संसद का है, यानि अप्रत्यक्ष रूप से उन्होंने यह संकेत दे दिया कि यह निर्णय करने का अधिकार न्यायपालिका को नहीं है बल्कि केवल
संसद को है.

संसद सदस्यों की पेंशन के पक्ष में प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक है, क्योंकि अब देश में राजनैतिक लोग कुछ भी छोडऩा नहीं चाहते बल्कि केवल लेना चाहते हैं. मैं जानता हूं कि सांसदों की पेंशन के पक्ष में सत्ताधारी दल, विपक्ष, सभी एक मत होंगे. हमारी संसद का यह चरित्र ही बन रहा है कि अपने स्वार्थ पर एकजुट होती हैऔर राष्टï्रीय हितों पर विभाजित होती है. हालांकि इसीलिये संसद आम लोगों में अपनी साख भी खो रही है. दरअसल पेंशन के पक्ष में देश की सभी विधायिकायें भी खड़ी होंगी, क्योंकि विधायकगण इतने सुजान तो हैं हीं, कि वे जानते हैं कि अगर सांसदों की पेंशन बंद हो जायेगी तो फिर उनकी भीपेंशन बंद हो जायेगी.

सांसदों की पेंशन को मैं तीन कसौटियों पर देखना चाहूंगा- संवैधानिक प्रावधान, पेंशन की शुरुआत का इतिहासऔर पेंशन का औचित्य और राष्टï्रीयसमानता का व्यवहार. अरुण जेटली एक योग्य बड़े नामधारी वकील हैं. अत: वे यह अवश्य जानते होंगे कि किसी भी कानून की संवैधानिकता की परीक्षा का अइधकार सर्वोच्चन्यायालय का है. नि:संदेह कानून बनाने का अधिकार संसद को है. दरअसल जो लोग संविधान सभा में पहुंचे वे किसी न किसी रूप में भारत की आजादी के आंदोलन के सहयात्री थे, और इसीलिये उनमें इतनी नैतिकता और राष्टï्रप्रेम था कि उन्होंने संसद सदस्य या विधायक के कार्य के अनुसार वेतन-भत्ते आदि की व्यवस्था की थी.

सांसद या विधायक का पद कोई नौकरी नहीं है, बल्कि निर्वाचित पद है, जिसमें चुने जाने वाला व्यक्ति अपनी स्वेच्छा से निर्वाचन में समाजसेवा के लिये खड़ा होता है और नि:स्वार्थ सेवा के लिए मतदाताओं से समर्थन मांगता है, इसीलिये निर्वाचित होने के बाद से लेकर उसके निर्वाचन की अवधि तक उसके जीवन-यापन को वेतन देना,उसके विधायिकी कार्य के लिए राजधानी में आवास उपलब्ध कराना, आने-जाने की यात्रा की व्यवस्थाकरना यह राष्टï्रीय दायित्व मान कर वेतन-भत्ता, आवास आदि की व्यवस्था की गई थी.

1976 में जब देश में आपातकाल था, श्रीमती इंदिरा गांधी की सरकार ने सांसदों को पेंशन देने का कानून पारित किया. चूंकि उस समय न्यायपालिका के अधिकार निलंबित थे अत: इस कानून की संवैधानिक और न्यायिक समीक्षा नहीं हो सकी तथा कानून लागू हो गया. कालान्तर में राज्यों की विधानसभा में भी विधायकों की पेंशन के कानून पारित कर लिये गये.

इंदिरा जी आपातकाल को लेकर अपनी पार्टी के भीतर के सांसदों और विधायकों के असंतोष को शांत करना चाहती थी. इसके अलावा उनके पुत्र स्व. संजय गांधी को प्रधानमंत्री बनाने के लिये सांसदों की पीढ़ी बदलना चाहती थी और पुराने पीढ़ी के सांसदों के टिकिट काट कर संजय गांधी के समर्थक, नये युवाओं की टोली को टिकिट देना चाहती थी, ताकिसंजय गांधी के निर्वाचन में कोई दिक्कत न हो. पुराने लोगया नेहरू काल के लोग संजय को उतनी आसानी से (अपवाद छोड़कर) स्वीकार नहीं कर पाते. नारायण दत्त तिवारी जैसे शख्स जो संजय गांधी, के जूता उठाओ मुख्यमंत्री के रूप में प्रसिद्ध हुए वह अपवाद ही थे, इसीलिये उम्रदराज सांसदों को एक प्रकार से अनिवार्य सेवानिवृत्ति देने के लिये यह पेंशन कानून पारित किया गया था ताकि वे विद्रोह न कर सकें व शांत रहें.

सरकार वैश्वीकरण के दौर के बाद अब कर्मचारियों की पेंशन तक को समाप्त कर रही है तथा पेंशन समाप्ति के पहले कदम के रूप में अंशभागी पेंशन योजना लागू कर रही है जिसके अनुसार कर्मचारी को अपने सेवा काल में अपने वेतन में से एक हिस्सा पेंशन के अंशदान के रूप में जमा करना होगा और उसमें कुछ हिस्सा सरकार मिलायेगी. यह पेंशन भी संपूर्ण जीवन काल के लिये नहीं होगी बल्कि इस समायोजन की प्रक्रिया से प्राप्त राशि के समाप्त होने तक दी जायेगी.

देश के करोड़ों अस्थायी कर्मचारियों और श्रमिकों के लिये, बेरोजगारों के लिये पेंशन नहीं है. सांसदों को पेंशन न केवल असंवैधानिक है बल्कि अलोकतांत्रिक भी है. यह लोकतंत्र की बुनियादी समानता व सिद्धांत के भी विपरीत है और जनभावनाओं के भी.

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