Supreme-Courtनयी दिल्ली,  भारत-पाकिस्तान के बीच सिंधु जल समझौते की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए उच्चतम न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर कर की गयी है, जिस पर सामान्य प्रक्रिया के तहत सुनवाई होगी। वकील मनोहर लाल शर्मा ने यह जनहित याचिका दायर की है। मुख्य न्यायाधीश टी एस ठाकुर की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि इस याचिका पर जल्द सुनवाई की जरूरत नहीं है।

यह संधि 1960 से अब तक चली आ रही है। राजनीति को अदालत से दूर रखने की सलाह देते हुए न्यायमूर्ति ठाकुर ने कहा कि इस याचिका पर सामान्य प्रक्रिया के तहत ही सुनवाई होगी। गौरतलब है कि जम्मू-कश्मीर के उरी सेक्टर में सैन्य शिविर पर हुए आतंकवादी हमले के परिप्रेक्ष्य में सिंधु जल संधि को रद्द करने की मांग हो रही हैं, ताकि पाकिस्तान पर आतंकवादी गतिविधियों को शह देने से रोकने के लिए दबाव बढ़ाया जा सके।

वर्ष 1960 के सिंधु जल समझौते के मुताबिक, पाकिस्तान को भारत से बहने वाली छह नदियों का पानी मिलता है। इसी पानी से पाकिस्तान में कई परियोजनाएं चल रही हैं और सिंचाई की जा रही है। इस संधि के तहत ब्यास, रावी, सतलज, सिंधु, चिनाब और झेलम नदियों के पानी का दोनों देशों के बीच बंटवारा होता है।

प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपाति अयूब खान ने सितम्बर, 1960 में इस संधि पर हस्ताक्षर किये थे । पाकिस्तान यह शिकायत करता आ रहा है कि उसे पर्याप्त पानी नहीं मिल रहा है और वह कुछ मामलों में अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के लिए भी आगे गया है।

सिंधु जल समझौते के तहत छह नदियों- ब्यास, रावी, सतलुज, सिंधु, चिनाब और झेलम का पानी भारत और पाकिस्तान को मिलता है। समझौते के मुताबिक, सतलुज, व्यास और रावी का ज्यादातर पानी भारत के हिस्से में रखा गया जबकि सिंधु, झेलम और चिनाब का अधिकतर पानी पाकिस्तान के हिस्से में गया।

Related Posts: