नयी दिल्ली,  उच्चतम न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसले में तलाक-ए-बिदअत (लगातार तीन बार तलाक कहने की प्रथा) को असंवैधानिक तथा गैर इस्लामिक करार देते हुए निरस्त कर दिया.

मुख्य न्यायाधीश जे एस केहर, न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ, न्यायमूर्ति उदय उमेश ललित, न्यायमूर्ति रोहिंगटन एफ नरीमन और न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर की संविधान पीठ ने बहुमत के फैसले के आधार पर तलाक-ए-बिदअत को असंवैधानिक और गैर-इस्लामिक करार दिया. संविधान पीठ ने अपने 395 पृष्ठ के फैसले में लिखा है, ‘इस मामले में न्यायाधीशों के अलग-अलग मंतव्यों को ध्यान में रखते हुए तलाक-ए-बिदअत अथवा तीन तलाक की प्रथा को (3:2 के) बहुमत के फैसले के आधार पर निरस्त किया जाता है.

न्यायमूर्ति केहर और न्यायमूर्ति नजीर ने तीन तलाक की प्रथा को इस्लाम के अनुरूप बताया, लेकिन न्यायमूर्ति नरीमन, न्यायमूर्ति जोसेफ और न्यायमूर्ति ललित ने इसे संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत प्रदत्त समानता के अधिकारों के खिलाफ करार दिया तथा इसे असंवैधानिक एवं गैर-इस्लामिक बताया. मुख्य न्यायाधीश ने अपना तथा न्यायमूर्ति नजीर संयुक्त फैसला सुनाते हुए कहा कि तीन तलाक पाप हो सकता है, लेकिन न्यायालय को पर्सनल लॉ के मामले में दखल नहीं देना चाहिए. मुख्य न्यायाधीश ने सरकार को तीन तलाक के मामले में कानून बनाने की सलाह दी और छह माह तक तलाक-ए-बिदअत पर रोक लगाने का आदेश दिया.

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