संभवत: संसार में ही पहली बार भारत के सुप्रीम कोर्ट के 4 वरिष्ठ जजों ने अपने ही चीफ जस्टिस श्री दीपक मिश्रा के तौर तरीकों से दुखी व त्रस्त होकर प्रेस कान्फ्रेंस के माध्यम से अंदरुनी विवाद को सार्वजनिक विवाद का मामला बना दिया.

मामला अप्रत्याशित और अजीब है इसलिये यह दूर तक जायेगा. इससे निश्चित ही सुप्रीम कोर्ट जैसी निर्विवाद रहने वाली संस्था विवाद बन गयी. यह भी एक विडम्बना है कि जो संस्था विवादों को निपटाने में अंतिम निदान है उसी में विवाद उत्पन्न हो गया और वह भी वहीं के 4 जजों द्वारा किया गया. प्रारंभिक प्रतिक्रियाओं में कुछ विद्रोही जजों का समर्थन करते नजर आये वहीं कई उनकी भत्र्सना कर रहे हैं.

केंद्र सरकार ने इसे सुप्रीम कोर्ट का अंदरूनी प्रक्रियात्मक आपसी झगड़ा माना है और इस मामले में न पडऩे का रुख लिया है.

सरकार का विचार है इस अंदरूनी मामले को निपटाने की व्यवस्था सुप्रीम कोर्ट के अंदर ही मौजूद है और वे ही उसका निदान करेंगे. कांग्रेस सरकारों में केन्द्रीय कानून मंत्री रहे श्री सलमान खुर्शीद, जो सुप्रीम कोर्ट में प्रेक्टिस भी करते हैं उनका भी यह विचार है कि इस मामले को सुप्रीम के चीफ जस्टिस व अन्य जज ही मिलकर निपटायें. इसमें बाहरी हस्तक्षेप नहीं होना चाहिये.

जाहिर तौर पर सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस ही वहां के संविधान के अनुच्छेद 124 के तहत उस संस्था के प्रमुख हैं और उस नाते वे ”मास्टर आफ रोस्टर” होते हैं. इसके तहत वे अन्य जजों को केस अलाट करते हैं और कई मामलों में संवैधानिक पीठ की व अन्य मामलों में बेन्च का गठन करते हैं.

चारों असंतुष्ट जजों श्री चेलेश्वर, श्री मदन लोकुर, श्रीकुरियन जोजफ और श्री रंजन गोगई की तरफ से श्री चेलेश्वर ने अपने निवास पर इन चारों जजों की उपस्थिति में प्रेस कान्फ्रेंस बुलायी.

उन्होंने चीफ जस्टिस श्री दीपक मिश्रा पर आरोप लगाये कि इन जजों ने उन्हें 2 महीने पहले एक पत्र लिखा था कि सुप्रीम कोर्ट में व्यवस्था ठीक नहीं चल रही है. प्रेस कान्फ्रेंस में पहले वे उनसे मिले भी थे. लेकिन चीफ जस्टिस ने उनकी बातों को नजरअंदाज कर दिया.

जजों के आरोप हैं कि चीफ जस्टिस श्री दीपक मिश्रा सामूहिक मामलों में भी सामूहिक निर्णय नहीं लेते. केस अलाट करने व पीठ गठन करने में वरिष्ठ जजों की उपेक्षा कर उनसे जूनियर जजों को महत्वपूर्ण केस व पीठ में जज बनाते हैं. रोस्टर की प्रक्रिया व नियमों का पालन नहीं करते. जजों ने कुछ केस का उल्लेख किया कि उनमें अकारण देरी की गयी और हाईकोर्ट के मामलों में भी दखल दिया.

इस मामले में सी.बी.आई. जज श्री लोया की संदिग्ध मौत का भी उल्लेख किया. जिसकी बाम्बे हाईकोर्ट में सुनवाई का जिक्र किया, जिनके सामने केस में भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष श्री अमित शाह भी लिप्त हैं.

जजों ने अपने पक्ष में यह भी कह डाला कि इससे लोकतंत्र को खतरा है और वह ऐसे नहीं चलता है. वे अंतर आत्मा को बेच नहीं सकते. कुल मिलाकर यह मामला 4 वरिष्ठ जजों का चीफ जस्टिस से टकराव और उपेक्षित किये जाने का मामला है इसे सुप्रीम कोर्ट के बाहर प्रेस कांफ्रेंस में तूल नहीं दिया जाना था.

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