सरकार जब किसी टैक्स पर किसी खास प्रयोजन के लिये अलग से कुछ राशि वसूलती है तो उसे ‘सेस’ (उपकर) कहती है. जब किसी टैक्स पर ही टैक्स लगाती है तो उसे सरचार्ज कहा जाता है और जनहित में किसी वस्तु का भाव एक सीमा से रखने के लिये उसके मूल्य पर वस्तु निर्माता या बेचने वाले को घाटापूर्ति राशि देती है तो उसे सब्सिडी कहा जाता है.

अब तक सबसे ज्यादा सेस पेट्रोल-डीजल पर लगाया गया है. जब बंगलादेश में स्वाधीनता युद्ध चल रहा था उस समय के पूर्वी पाकिस्तान से भारी संख्या में शरणार्थी उसी तरह भारत में आये, जैसे इन दिनों सीरिया युद्ध से त्रस्त सीरियाई लोग यूरोपीय देशों में शरणार्थी बनकर घुस पड़े हैं. पूर्वी पाकिस्तान से इतनी ज्यादा संख्या में शरणार्थी भारत आये कि उसके लिये बजट में कोई प्रावधान नहीं था और भारी-भरकम खर्चा रोजाना बढ़ता जा रहा था.

उस समय प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने पेट्रोल पर ‘रिफ्यूजी सेस’ लगाया. एक समय कुवैत पर इराक द्वारा कब्जा किये जाने के विरुद्ध अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश (प्रथम) ने इराक पर हमला किया था इसे ‘गल्फ वार’ कहा गया था. यह हमला महज 6 दिन ही चला, लेकिन भारत के प्रधानमंत्री श्री चन्द्रशेखर ने इसी बहाने पेट्रोल पर ‘गल्फ सेसÓ लगा दिया. दोनों सेस उसके भावों में आज तक कायम हैं.

मोदी सरकार के सामने ऐसी कोई विपदा तो नहीं आयी, लेकिन उन्होंने गांधीजी के चरणचिन्हों पर चलने के नाम पर ‘स्वच्छ भारत’ का नारा लगा एक कार्यक्रम दिया. उसका खर्चा वसूलने के लिये लगभग सभी चीजों पर ‘सर्विस टेक्स’ में स्वच्छ भारत सेस लगा दिया. रसोई गैस की संख्या सीमित कर उस पर सब्सिडी छोडऩे की मुहीम भी इसी भावना से की जा रही है कि उस राशि को प्राइमरी व मिडिल शिक्षा पर खर्च किया जायेगा.

पेट्रोल-डीजल पर सब्सिडी खत्म करके उसे बाजार भाव से जोड़कर व्यवस्था की थी कि पेट्रो क्रूड के भावों के चढ़ाव-उतार के अनुसार पेट्रोल-डीजल के भाव भी बढ़ेंगे या घटेंगे. जब क्रूड के भाव बढ़े तो सरकार के टैक्सों में भी उसी अनुमान में वृद्धि हो गयी लेकिन जब भाव गिरे तो केंद्र व राज्य सरकारों ने एक्साइज, एंट्री व वेट की दरें बढ़ाकर उस लाभ को आम जनता तक न पहुंचने देने का विश्वासघात कर दिया.

अब केंद्र सरकार के सी.ए.जी. (कंट्रोलर एंड आडीटर जनरल) की रिपोर्ट से यह भी सामने आ गया कि केंद्र सरकार सेस का जाल बिछाकर आम जनता के साथ जालसाजी भी कर रही है. सरकार कई तरह के सेस वसूल कर रही है. कभी पढ़ाई, कभी सफाई के नाम पर. सी.ए.जी. का कहना है कि सेस का जाल इतना फैला है कि यह अंदाजा नहीं लगा सकते कि सरकार के पास कितना रुपया साल दर साल इक_ïा हो रहा है.

उससे भी बड़ा घात और आघात और विश्वासघात जनता के साथ यह हो रहा है कि उसका इस्तेमाल नहीं हो रहा और वह व्यर्थ पड़ा है या उसे उस काम पर खर्च नहीं किया जिसके नाम पर सेस लगाया गया और उसे दूसरे कामों में खर्चा दिखा दिया.
सी.ए.जी.आडिट रिपोर्ट में कहा गया है कि 1996 से 2015 तक गत 20 वर्षों में कई सेस के नाम पर जो 15 लाख करोड़ रुपया इक_ïा हुआ वह व्यर्थ पड़ा है उसका कोई इस्तेमाल नहीं किया गया.

सन् 2006 से सेकेण्ड्री व उच्च शिक्षा के नाम पर सेस वसूली जा रहा है. सन् 2015 तक इन 9 सालों में 64,288 करोड़ रुपये इक_ïा हुए और आज तक उसका इस्तेमाल नहीं हुआ और उसमें बड़ा घपला यह है कि अभी तक उसका फंड नहीं बनाया जहां यह सेस जमा होता वह अनाधिकृत रूप से बिना ‘हेडÓ के जाने कहां पड़ा है. यह भी अंदेशा हो रहा है कि इस रुपयों को कहीं अन्य खर्च करके या खर्चा दिखाकर उसमेें भारी अफरा-तफरी भी हो चुकी है.

युनिवर्सल सर्विस ऑब्लिगेशन फंड के नाम पर 2002-03 और 2014-15 में टेलिकॉम सर्विस प्रोवाइडर्स की इनकम पर 5 फीसदी सेस लगाया गया. लेकिन उसका 60 फीसदी हिस्सा यानि 39000 करोड़ रुपये का इस्तेमाल नहीं हुआ. 2012 के बाद सरकार ने निर्भया फंड की घोषणा की जिसके जरिये महिलाओं के लिये सुरक्षा मानकों को लागू करने की बात कही गई. 2015 तक 3000 करोड़ रुपये इस फंड में जुटा लेकिन आज तक कोई भी प्रोजेक्ट शुरू नहीं हुआ है.

इसी तरह कई फंड बने जिसमें वसूले गए सेस का पैसा पड़ा है. जैसे द नेशनल क्लीन एनर्जी फंड, द रिसर्च एंड डेवलपमेंट सेस फंड, द सेंट्रल रोड फंड, द इनकम टैक्स वेल्फेयर फंड, द कस्टम्स एंड सेंट्रल एक्साइज वेल्फेयर फंड ऐसे फंड्स में 14.5 करोड़ रुपए बिना किसी इस्तेमाल के पड़ा है. इसके बावजूद सरकार नए-नए सेस हम पर लगाने से नहीं चूक रही. हाल ही में लगा 0.5 फीसदी का स्वच्छ भारत सेस जिसके बढऩे की आशंका है.

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