भारत की संसदीय राजनीति में 19 मार्च को लोकसभा में एक नयी विधा, वाद व शैली विकसित हो गयी जिसे कई नाम के ‘वाद’ में एक और हंगामावाद भी कहा जा सकता है.

अभी तक संसद में सरकार को एक दिन पहले 18 मार्च तक यह शिकायत रही कि विपक्ष की किसी न किसी बात पर हंगामा करके सदन को चलने और सरकार को विधायी काम नहीं करने दे रहा है.

लेकिन 19 मार्च को एकाएक स्थिति निर्मित हो गयी कि विपक्ष को यह शिकायत हो गयी कि सरकार ने एक विपक्षी दल अन्ना द्रमुक को साधकर सदन में हंगामा कराकर सदन इसलिए स्थगित करा दिया कि उसके खिलाफ विपक्ष द्वारा लाया जाने वाला मोदी सरकार के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पेश ही न हो सके और यही हो भी गया. दूसरे दिन 20 मार्च को फिर अविश्वास प्रस्ताव पेश होगा और पूरी संभावना यही दिख रही है कि यह सिलसिला जारी रहेगा और उस प्रस्ताव को पेश होने से रोका जाता रहेगा.

संसद में हंगामा राजनीति भारतीय जनता पार्टी ने उस समय शुरू की जब उसकी प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार चुनाव में हार कर विपक्ष में आ गयी और विपक्ष में ही कांग्रेस नेतृत्व की यू.पी.ए. सरकार बन गयी और पूरे दो टर्म 10 साल तक सत्ता में रही.

उस समय भी विपक्ष में भारतीय जनता पार्टी ने स्पेक्ट्रम, कोल ब्लाक आदि की अन्य मसलों से सदन में लगातार हंगामे की स्थिति निर्मित की. इसी अवधि में संसद का एक सत्र पूरा का पूरा हंगामे की भेंट चढ़ गया, बिना कोई काम किये खत्म हो गया.

अभी इस समय आंध्र की तेलगू देशम पार्टी और वाई.एस.आर. पार्टी ने सदन में मोदी सरकार के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव रखा जिसमें यह कहा गया है कि मोदी सरकार ने आंध्र राज्य से तेलंगाना को अलग राज्य बनाते समय विशेष राज्य का दर्जा देने का वादा किया था और अब वह उसे पूरा नहीं करना चाहती.

19 मार्च से पहले भी 16 मार्च को अविश्वास प्रस्ताव पेश किया था और उस दिन भी हंगामे की ही स्थिति में सदन स्थगित होने से पेश नहीं हो पाया. इस समय विपक्ष लामबंद हो गया है और आंध्र की दोनों पार्टियों के अलावा कांग्रेस, समाजवादी, तृणमूल माक्र्सवादी आदि सभी अविश्वास प्रस्ताव को समर्थन दे रहे हैं.

प्रस्ताव को चर्चा में लेने के लिये 50 सदस्य चाहिये जो इस प्रस्ताव के पक्ष में जुट गये हैं. इस समय एनडीए की मोदी सरकार से तेलगू देशम पार्टी अलग हो गयी है और सरकार में शामिल शिवसेना ने भी यह ऐलान कर दिया है कि वह अविश्वास प्रस्ताव पर तटस्थ रहेंगी. इसमें मोदी सरकार का बहुमत बहुत कम हो गया है.

एक अनुमान के अनुसार उनके पास मात्र एक वोट का बहुमत बचा है जबकि भारतीय जनता पार्टी का अभी भी यह दावा है कि उसके पास दो तिहाई का बहुमत है. इस समय तटस्थ रहकर शिवसेना भारतीय जनता पार्टी पर भारी दबाव बनाकर महाराष्ट्र में आगामी लोकसभा चुनावों में ज्यादा सीटों के लिए सौदेबाजी कर सकती है.

विपक्ष को यह भरोसा हो रहा है कि वह थोड़ी और भारतीय जनता पार्टी के खेमे में तोडफ़ोड़ कर मोदी सरकार को अविश्वास प्रस्ताव पर गिरा देगी. यह आभास भी हो रहा है कि मोदी सरकार भी यह समझ रही है कि उसके समर्थन की पार्टियां इस स्थिति में या तो उससे बहुत कुछ पाना चाहेंगी या उसके खिलाफ हो जायेंगी. इस समय जो स्थिति है वह मोदी सरकार के लिये संकट की घड़ी और अग्नि परीक्षा है.

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