इस समय भारत और चीन दुनिया की दो सबसे तेज बढ़ती हुई अर्थव्यवस्थाएं या देश है. लेकिन उन्हें प्रतिस्पर्धा के रूप में देखना बिलकुल गलत तरीका है. दुनिया का हर देश उसकी अपनी राजनैतिक व सामाजिक व भौगोलिक स्थितियों में प्रगति करते है. इसमें सबसे बड़ी भूमिका इस बात की होती है कि उस देश की राजनीतिक व्यवस्था कैसी है.

आज पाकिस्तान, अफगानिस्तान, अरब राष्टï्रों में इस्लामी स्टेट व अलकायदा का आतंकवाद पूरी तरह हावी है. उन देशों में आर्थिक प्रगति न सिर्फ रुकी पड़ी है बल्कि पीछे जा रही है. व्यापार व विकास की पहली जरूरत राजनैतिक स्थिरता और अनुकूल टैक्स प्रणाली व पूंजी व्यवस्था होती है.

देशों की स्थितियां भी बड़ी विचित्र होती है. चीन दुनिया में सबसे ज्यादा कपास पैदा करता है. और भारत दूसरे नंबर पर है. पर चीन ही भारत की कपास का सबसे बड़ा खरीददार है. लेकिन वह अपनी राजनीति में पूरी तौर पर भारत पर निर्भर ही नहीं रहना चाहता है. इसलिये महंगी पडऩे पर भी अमेरिका से भी खरीदता रहता है. एक साल उसने भारत से कपास आयात बहुत कम कर दिया तो पूरे भारत का कपास निर्यात व्यापार व व्यापारी-किसान लडख़ड़ा गया.

आज भी चीन अपने औद्योगिक उत्पादन का ऊंची क्वालिटी का माल अमेरिका व यूरोप को भेजता है. क्योंकि वहां प्रति व्यक्ति लोगों की खरीददारी क्षमता (परचेजिंग पावर) अच्छी है. सस्ता व हल्की क्वालिटी का माल वह भारत सहित अन्य एशियाई व अफ्रीकी देशों में भेजता है. इसे वह बेईमानी नहीं मानता बल्कि वह कहता है वह खरीददारों की हैसियत देखकर माल बनाता व
बेच रहा है.

भारत विशाल भू-भाग का देश है. यहां रेलों से भी कहीं ज्यादा माल व यात्री परिवहन ट्रकों व बसों व कारों से होता है. इस कारण यहां ट्रकों के टायर का बाजार भी बहुत बड़ा है. हमारे यहां केरल में रबड़ की खेती भी होती है. और बहुत पास के देश मलेशिया में सबसे ज्यादा कच्ची रबड़ होती है. जिनका आयात भी भारत में काफी सस्ता पड़ता है. इसके अलावा अब सिन्थेटिक रबड़ भी बनने लगी है. भारत में टायर ट्यूब के बड़े-बड़े उद्योग भी हैं जो बहुत ही ऊंची क्वालिटी के टायर बनाते हैं. उसके बाद भी भारत के बाजारों में चीन में बने हल्की क्वालिटी के टायर इतने छा गये हैं कि भारत के नामी गिरामी टायर उद्योग माल न बिकने से परेशान हो रहे हैं और उन्होंने चीन पर टायर डंपिंग का आरोप लगाते हुए सरकार से उसके माल पर एंटी डंपिंग ड्यूटी लगाने की मांग की है.

चीन ने यह भी सिद्ध कर दिया बाजार में ऊंची क्वालिटी के मुकाबले हल्की क्वालिटी का माल भी इसलिये ज्यादा बिकता है कि वह सस्ता पड़ता है और उससे काम भी चल जाता है. भारत में चीन से ट्रक व बस के टायरों का आयात बढ़ता जा रहा है. 2015-16 में यह 64 प्रतिशत बढ़कर 12.8 लाख यूनिट हो गया जो इसके पिछले वर्ष 7.8 लाख यूनिट था. इसी से सहज अंदाजा हो जाता है जहां चीन का माल 64 प्रतिशत बढ़ा है उससे हमारे देश के टायर निर्माताओं पर कितना बुरा असर पड़ा होगा. माल का उठाव नहीं हुआ. वे तो घाटा खाकर बंद हो जायेंगे. इस समय चीन का टायर सप्लाई 90 प्रतिशत हो गया है.

लेकिन मोदी सरकार के वित्त मंत्री श्री अरुण जेटली इस मुगालते में चल रहे हैं कि देश की जीडीपी दर 7.5 प्रश. है और देश को जश्न मनाना चाहिए. जबकि प्रति व्यक्ति जीडीपी के आधार पर हम अभी भी दुनिया के सबसे गरीब देशों में से एक हैं. देश की सही प्रगति इसमें नहीं है कि राष्टï्र की जीडीपी बढ़ी है बल्कि इसमें है कि प्रति व्यक्ति आय (पर केपीटा) कितनी बढ़ी. व्यक्ति का जीवन स्तर उसके आय के अनुसार ही बढ़ता है. उसके खरीदने की ताकत बढऩी चाहिए. तभी कृषि व उद्योग में उन्नति होगी.

इस समय भारत के औद्योगिक संस्थानों की जो उत्पादन (मेन्यूफेक्चरिंग) क्षमता है उसमें से केवल 70 प्रतिशत का उपयोग हो पा रहा है. 30 प्रतिशत उत्पादन घाटा तो सतत् हो रहा है. कम्युनिज्म के दौर में सोवियत संघ में राष्ट्र की आर्थिक उन्नति तो हुई- वह दुनिया की सुपर पावर बन गया, लेकिन उस व्यवस्था में व्यक्ति की आय एक बिन्दु पर स्थिर ही हुई और पूरी विचारधारा ऐसी ध्वस्त हुई कि सोवियत यूनियन ही ध्वस्त हो गया.

पून्जीवादी व प्रजातंत्रीय व्यवस्था में प्रत्येक व्यक्ति, उद्योग व खेत की आय में वृद्धि होना चाहिए. लेकिन आज हालत यह है कि दिनोंदिन महंगाई बढऩे से लोगों की परचेजिंग पावर ही घटती जा रही है. क्या देश इस बात का जश्न मनाये कि आज दाल खाना भी दुश्वार हो गया और अब गेहूं ने भी रफ्तार पकड़ ली है. मोदी सरकार राष्टï्र की जी.डी.पी. के साथ प्रति व्यक्ति आय भी देखे. वर्ना टायर की तरह हर क्षेत्र में चीन का सस्ता माल ही बिकेगा.