mp1इंदौर,  दो सेनाओं के बीच अग्निबाण से होने वाले युद्ध की कहानी आपने जरूर पड़ी या सुनी होगी. रामायण और महाभारत सीरियल में आग उगलने वाले तीरों की बारिश भी आपने देखी होगी. ऐसा ही एक युद्ध गुरुवार शाम देपालपुर के गौतमपुरा में लड़ा गया. कलंगी और तुर्रा दलों के बीच हुए इस हिंगोट युद्ध को देखने के लिए हजारों की भीड़ जमा थी. युद्ध में शामिल दो सेनाओं ने एक-दूसरे पर आग से भरे हिंगोट बरसाए. इस अग्नियुद्ध में 40 लोग घायल हो गए. इनमें से 3 की हालत गंभीर बताई जा रही है.

अंधेरे में बरसते रहे अग्निबाण
शाम ढलते ही मैदान में अग्निबाणों की वर्षा शुरू हो गई थी. चारों तरफ सर्र-सर्र करते अग्निबाण बरसने लगे थे. आग से भरे ये हिंगोट कई बार मैदान में जमा दर्शकों के बीच जा गिरे, तो कभी लड़ाकों को घायल करते हुए निकल गए. लेकिन परंपरा का रोमांच इतना ज्यादा था कि जंग जारी रही. सूर्यास्त के बाद दोनों दलों ने मंदिर में दर्शन के बाद लड़ाई शुरु की. लड़ाके एक हाथ में ढाल और दूसरे में हिंगोट लेकर मैदान में उतरे थे. ये लोग ढाल से खुद का बचाव कर रहे थे, जबकि हिंगोट को जलाकर विरोधी सेना पर फेंक रहे थे.

कौन लड़ता है हिंगोट युद्ध
मौत की ये लड़ाई गौतमपुरा और रुणजी गांव के लोगों के बीच होती है. गौतमपुरा के योद्धाओं के दल का नाम तुर्रा है, जबकि रुणजी गांव के लड़ाके कलंगी दल की अगुवाई करते हैं. जब लड़ाके इस हिस्से में आग लगाकर फेंकते हैं तो यह राकेट की तरह उड़ता हुआ जाता है. युद्ध के दौरान लडाके तो घायल होते ही हैं.

। साथ ही, दर्शको को भी खतरा बना रहता है, लेकिन इसका रोमांच उन्हें यहां खींच लाता है। इसे देखने हर बार हजारों की तादाद में लोग आते हैं। अब गांव के लोग और प्रशासन सुरक्षा के इंतजाम भी करने लगे हैं। लेकिन खतरा तो अभी भी बना ही रहता है। पिछले साल हिंगोट में लगभग 80 लोग घायल हुए थे।

वर्षों पुरानी है परंपरा
देपालपुर में हर साल दिवाली के दूसरे दिन अग्नि युद्ध यानी हिंगोट युद्ध होता है। गांव के बुजुर्ग प्रकाश चौधरी बताते हैं कि ये बताना मुश्किल है कि यह परंपरा कब से शुरू हुई। लोग कहते हैं कि इसका चलन मुगलों के शासन के दौरान यानी लगभग दो सौ साल पहले हुआ था। तब से अब तक यह परंपरा इसी तरह चली आ रही है।

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