प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने 10वें विश्व हिन्दी सम्मेलन का राजधानी भोपाल में उद्घाटन करते हुए अपनी उस स्थिति की कल्पना करते हुए कहा कि अगर हिन्दी नहीं आती तो उनका क्या होता. वे न तो भारत को समझ पाते और न ही प्रधानमंत्री पद पर होते.

बीच में एक अहिन्दी भाषी श्री देवगौड़ा प्रधानमंत्री बने थे, लेकिन अपनी क्षेत्रीय और अंग्रेजी के ज्ञान से जनमानस तक पहुंच नहीं पाये. वे संविधान के तहत एक पदाधिकारी भर रहे, जननेता नहीं हो पाये. कांग्रेस में जब प्रधानमंत्री के नामों में श्री प्रणव मुखर्जी का नाम लिया जाता तो वे खुद ही कहते रहे कि अहिन्दी भाषी होने के कारण सफल प्रधानमंत्री नहीं हो पायेंगे. आजादी के संघर्ष में गांधीजी सभी कांग्रेसजनों से कहा था कि यदि वे उन्हें सुनना चाहते हैं तो हिन्दी सीख लें. विश्व हिन्दी सम्मेलन को जन्म देने वाली भारत की संस्था राष्टï्रभाषा प्रचार समिति गांधी जी वर्धा आश्रम में ही उन्हीं दिनों गांधी जी की प्रेरणा से स्थापित की गयी थी जो आज तक अपने इस महान कार्य में तन्मयता से लगी हुई है. उसी के प्रयासों से दुनिया या विश्व हिन्दी सम्मेलन की स्थापना हुई और इन दिनों उसका 10वां सम्मेलन भोपाल में चल रहा है.

सम्मेलन में अपने उद्बोधन में श्री मोदी ने कहा कि हिन्दी इस देश की विरासत है. इसे बनाना व बढ़ाना हर पीढ़ी का काम है. उन्हें हिन्दी भाषा की ताकत का अहसास है. उन्होंने गुजरात के वडऩगर रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म व ट्रेनों में चाय बेचते हुए हिन्दी सीखी है. भाषा की चेतना को नापा नहीं जा सकता. जीवन की तरह भाषा भी चैतन्य होती है. इसके विकास व प्रसार में हमें भाषाओं की कार्यशालाएं आयोजित करनी चाहिए. हिन्दी फिल्मों ने हिन्दी को जन-जन तक और विश्व के हर कोने तक पहुंचाया है. हिन्दी फिल्मों के गाने हर देश में गाये जाते हैं- लोग इनके दीवाने हैं. कई देशों में लोग हिन्दी इसलिये सीखते हैं कि वे हिन्दी फिल्मों व उनके गानों को उनके मूलरूप में समझ सकें. किसी भी भाषा को बन्द करके नहीं रखना चाहिए. संस्कृत भाषा लुप्त होती जा रही है. किसी भी लुप्त भाषा को पढऩे में सालों लग जाते हैं. हिन्दी से पहले देश में बौद्ध और मौर्य- मगध काल में प्राकृत, पाली व ब्राम्ही भाषा व लिपियां थीं, जिनमें आज भी कई शिलालेख लिखे मौजूद हैं, लेकिन अब इन्हें कोई नहीं समझता. दुनिया में लगभघ 6 हजार भाषाएं हैं. भाषाओं को जीवाश्म की तरह जड़ नहीं होने देना चाहिए. इनमें उनके समय की सभ्यता व संस्कृति समाहित रहती है. भाषा जहां से भी गुजरती है वहां लोगों को उसमें समाहित कर लेती है.

किसी भी भाषा को सरलता से सीखा जा सकता है. जिन लोगों की जीवनशैली में आवागमन ज्यादा होता है वे कई भाषाओं को पूरी तरह लिखने-बोलने समझने लग गये हैं. आने वाले समय में दुनिया में हिन्दी का प्रसार बढऩे वाला है. भारत की आर्थिक क्षमता के विस्तार भारत में व्यापार बढ़ाने के लिये जनमानस तक की पहुंच में हिन्दी का जानना अनिवार्य हो जायेगा. जब इतिहास चक्र में कोई भाषा लुप्त हो जाती है तब उस भाषा की कीमत पता चलती है.

सम्मेलन में हिन्दी दिवस का डाक टिकिट भी जारी किया गया. सम्मेलन में विदेश मंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज ने कहा कि अभी तक इसके जितने सम्मेलन हुये हैं उनमें साहित्य पर बल दिया जाता रहा. इस बार सम्मेलन की दिशा इस बात पर रखी गयी है कि भाषा का प्रसार करने के लिये क्या प्रयास किये जाने चाहिए.