देश में इस समय जल संकट गहराता ही जा रहा है. मध्यप्रदेश जिला मुख्यालय के बड़े नगर देवास का पिछले कई वर्षों से मालगाड़ी की तरह पानी की टेंकर ट्रेन पानी की आपूर्ति करती रही. इस साल महाराष्टï्र का लातूर नगर जल विहीन हो गया और ट्रेन की पानी स्पेशल से उस शहर को अगली बरसात तक सहारा दिया जा रहा है. लातूर की विपदा का एक कारण भौगोलिक व कृषि भी है. महाराष्टï्र में वर्षा सैहाद्री पर्वतमाला से होती है.

इसकी दक्षिण में दक्षिण-पश्चिम मानसून के बादल रूक जाते हैं और घनघोर वर्षा होती है और सैहाद्री के दूसरी ओर पानी काफी कम गिरता है. पिछले कई दशकों से महाराष्टï्र में शक्कर मिलों का जाल बिछ गया है और गन्ना किसानों के लिये सबसे बड़ी क्रेश क्राप बन गया है. काटन का स्थान दूसरा हो गया है. गन्ना की खेती को पानी काफी चाहिए. लातूर एरिया में एक-एक किसान ने कई-कई ट्यूबवेल खुदवा लिये. जमीन को छलनी कर दिया. इस गहन गन्ना सिंचाई से जमीन के नीचे का भूजल लगभग गायब हो चुका है. पूर्वी महाराष्टï्र का बढ़ता जा रहा जल अभाव का कारण वर्षा न होकर ट्यूबवेलों की भरमार हो गयी है. अन्य जगहों पर भी ट्यूबवेल भूजल के लिए विनाशकारी सिद्ध हो चुके हैं.

भारत के मध्यप्रदेश सहित 13 राज्यों में सूखा की स्थिति आ गयी है. मध्यप्रदेश में कई इलाकों में जल परिवहन से पानी पहुंचाया जा रहा है. सबसे बड़ा संकट यह भी है कि क्या इस तरह आने वाली बरसात तक सुगमता से पानी पहुंचाने का काम किया जा सकेगा. राज्य में अधिकांश बांध सूखने की स्थिति में आ गये हैं. हजारों हैंडपंप सूख गये और यह सिलसिला तेजी से बढ़ता जा
रहा है.

पिछले दो सालों से वर्षा कम हो गयी है. ऐसे में यही खबर बड़ी ही राहत वाली है कि प्रशांत महासागर में इस साल अलनीनो का प्रभाव नहीं होगा और भारत सहित दक्षिण एशिया में जून माह में आने वाली वर्षा समय पर आयेगी और इस साल भरपूर आयेगी. मौसम विभाग का आंकलन है कि आने वाली बरसात 106 प्रतिशत तक होगी. मानसून बिलकुल समय पर तीन जून को केरल और 10 जून को मध्यप्रदेश में पहुंच जायेगा.

कई स्थानों पर 111 प्रतिशत वर्षा हो जायेगी. पांच प्रतिशत ही ऐसे क्षेत्र हो सकते हैं जहां पानी की कमी हो सकती है. इन अनुमानों का यह असर तो हुआ है कि आर्थिक उद्योग क्षेत्र में उत्साह दिख रहा है और चिंता दूर हो गयी है. पिछले दो ïवर्षों 2014 और 2015 में देश की औसत वर्षा काफी कम 89 और 86 प्रतिशत रही. अब यह अगली वर्षा में 106 से 111 प्रतिशत तक होने का आंकलन हुआ है.
वर्षा का होना भी इस पर ज्यादा क्रम क्या और कैसा रहा. खेती के लिए यह कोई मायने नहीं रखता कि कितने इंच या सेन्टीमीटर बरसात हुई. उसके लिये यह जरूरी है कि उसका क्रम खेती के अनुसार चले.

प्रारंभिक वर्षा में खेतों में नमी व कचरा उगता है- उसकी सफाई की जाती है. बोनी का समय आता है उस समय मौसम खुला रहे और खेतों में जल भराव की स्थिति न बने. अंकुरण के समय वर्षा और बीच में खुलकर वर्षा का क्रम चलता रहे. कई बार ऐसा तो हुआ कि वर्षा जितनी होनी चाहिए उतनी तो हो गयी, लेकिन बीच में अन्तराल काफी लम्बा रहा या फसल पकने व कटने के समय पानी गिर गया.
कुल वर्षा और खेती की वर्षा का स्वरूप में संतुलन ही देश की वास्तविक वर्षा ऋतु होती है. अधिक या कम दोनों तरह की वर्षा खेती को बिगाड़ देती है. लेकिन इस साल की 106 से 111 प्रतिशत की वर्षा पीने के पानी की समस्या, बांधों, तालाबों के भरने की समस्या अवश्य हल हो जायेगी. इस समय सरकार को आने वाली अच्छी बरसात का पूरा लाभ लेने के लिये न सिर्फ मनरेगा बल्कि जल संसाधन विभाग को हर गांव में तालाब बनाकर उन्हें आने वाली बरसात में पूरा भर लेना चाहिए.

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