वास्तु का संबंध अनादिकाल से है

आज सामान्य जनता या प्रख्यात वास्तुविद् प्राचीन काल की इमारतों, मंदिरों, किलों आदि को देखता है तो आश्चर्य व्यक्त करता है कि बिना आधुनिक साधनों के यह निर्माण कैसे और किस कुशल विशेषज्ञ की देखरेख में किया गया होगा.

वैदिक युग के प्रारंभ में एक शरीरधारी प्राणी ने जनम लिया. जो शिशु न होकर पूर्ण विकसित इंसान था. इन्द्र आदि देवता उसके जनम से भयभीत हो गए.जैसे-जैसे समय बीतता गया उसका शरीर बढ़ता गया.

एक दिन वह इतना बढ़ गया कि स्वर्ग में उसका सामना करना असंभव हो गया. तब देवताओं ने इस विशालधारी शरीर की मुक्ति के लिए एक बड़ा गढढ़ा तैयार करवाया और उसे तोड़-मरोड़ कर गाड़ दिया. गाड़ते वक्त उत्तरपूर्व की तरफ यानि कि इशान कोण पर सिर रखा, दाहिना घुटना एवं कोहनी पश्चिमेत्तर यानि कि वायव्य कोण की तरफ, पैर व मल द्वार दक्षिण की ओर एवं बायां हाथ व घुटना पूर्व की ओर था.

आज के वास्तु शास्त्र का आधार वास्तु पुरुष के रूप में विश्वकर्मा जयंती मनाई जाती है. ऋगवेद में स्थापत्य एवं वास्तु का  स्पष्ट उल्लेख मिलता है. इससे स्पष्ट है कि प्रचीन काल में महिर्षियों ने वास्तु के बारे में चिंतन किया था. वास्तुशास्त्र की विशिष्टता के ज्ञान से यह स्पष्ट हो जाता है कि इन्द्रासन आकाश की वास्तु का उदाहरण हैं. जबकि वैदिक युग में मनुष्य के जीवन का केन्द्र धर्म था, इसीलिए अपनी समस्त रचनात्मक ऊर्जाओं का उपयोग धार्मिक स्थल के निर्माण कार्य में किया गया. उस समय मनुष्य अपने निवास स्थान को भी धर्म से जोड़कर बनाया करता था. उसमें सादगी भी थी और सौम्यता भी थी.

ह बात सर्वविदित है कि आज सामान्य जनता या प्रख्यात वास्तुविद् प्राचीन काल की इमारतों, मंदिरों, किलों आदि को देखता है तो आश्चर्य व्यक्त करता है कि बिना आधुनिक साधनों के यह निर्माण कैसे और किस कुशल विशेषज्ञ की देखरेख में किया गया होगा.

कहने का तात्पर्य यह कि वास्तुशास्त्रानुसार बने प्राचीन भवनों का साकार रूप मंदिरों में देखने को मिलता है. धीरे-धीरे जन लोगों में भौतिक सोच बढऩे लगी तो अपने निवास को वैभव व संपन्न बनाने के लिए एक परिवार में सुख-शांति के लिए वास्तुशास्त्र का उपयोग किया जाने लगा. परिवार व अपने घर की सुख-शांति के लिए वास्तुशास्त्र का उपयोग हर कोई करने लगा है. किंतु यह सही है कि वास्तुशास्त्र को थंबरूल ( अटल निर्णय) के हिसाब से न मानें . यदि सचमुच में सही और सकारात्मक प्रभाव पाना चाहते हैं तो इसके साथ अपनी जन्म पत्रिका का भी अध्ययन करवा लें जिससे जीवन में सदैव सुख-शांति बनी रहे.

——— ————रेणुसपन भट्टाचार्य

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