सागर, मंदसौर, झाबुआ के अन्नदाता संकट में

  •  जमीन मालिक किसानों को पता तक नहीं

सागर, सागर जिले में करीब 350 एकड़ भूमि की फर्जी रजिस्ट्रियां करा ली गई हैं और हकदार किसानों को पता तक नहीं चल सका. इस फर्जीवाड़े की आईजी, कलेक्टर, एसपी को भी शिकायत की गई है. अभी तक मात्र 2 मामले बनाए गए हैं. इसमें आश्चर्य की बात यह है कि क्रेतागण चैन्नई (तमिलनाडु) के बताए गए हैं. अधिवक्ता हरदास कुर्मी व प्रभावित किसानों ने बताया कि सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि एक ही गांव बिलैया की ही लगभग 182 एकड़ भूमि की (अलग-अलग किसानों की) रजिस्ट्री (फर्जी) करा ली गई हैं. इसके साथ ही खाताखेड़ी गांव की 90 एकड़ और करैया गांव की करीब 60 एकड़ भूमि की भी फर्जी तरीके से रजिस्ट्री करा ली गई है. इस मामले में अभी संतोष और रामकेश (दोनों भाई) की भूमि के मामले में प्रकरण दर्ज कर लिया गया है.  बिलैया गांव के उपस्थित किसान नरेन्द्र सिंह की 24 एकड़, नेतराम तिवारी 18 एकड़, इंद्रराज सिंह 15 एकड़, इंद्रराज सिंह, गोलन सिंह 6 एकड़, शिवराज सिंह 24 एकड़, हरनाम सिंह 5 एकड़, भूमि की फर्जी रजिस्ट्री होना बताया गया.  एक फर्जी रजिस्ट्री में जलंधर निवासी माखन, वीरेन्द्र घोषी को विके्रता दर्शाया गया है. जबकि इस गांव में एक भी घोषी परिवार नहीं है. इससे साबित होता है कि यह गोरखधंधा किस तरह फल-फूल रहा है.

एनजीओ, अनुदान की कवायद- श्री कुर्मी ने बताया कि यह फर्जी रजिस्ट्रियां किसी एनजीओ के लिए ही करवायी गई लगती है, ताकि अनुदान लोन या अन्य लाभ के लिए इनका उपयोग किया जा सके.

जिला प्रशासन गम्भीर नहीं- उन्होंने बताया कि कलेक्टर को हमने 22 सितम्बर 11 को शिकायत की थी. इसके अलावा अन्य किसानों ने भी अपनी परेशानी उनको बतायी थी, लेकिन केवल दो मामले ही दर्ज किए गए हैं, बाकी पर तब से अभी तक कोई कार्यवाही नहीं की गई है. जांच होने पर और मामले होंगे उजागर- फर्जी रजिस्ट्रियों, फर्जी के्रडिट कार्ड के मामलों की यदि गंभीरता से जांच की जाए तो जिलेभर में इससे भी कहीं ज्यादा मामले सामने आ सकते हैं. वैसे जिला प्रशासन का रूख ऐसे मामलों में अभी तक गंभीर और कड़ा दिखायी नहीं दिया है.

पटवारी ने शपथ पत्र दिया-  तत्कालीन पटवारी भरोसीलाल अहिरवार ने अपने शपथ पत्र में स्पष्ट किया है कि संतोष और रामकेश के मामले में 4 जून 08 को हुए बेनामे में संलग्र खसरा 5 साला की नकल मेरे द्वारा जारी नहीं की गई न ही मेरे हस्ताक्षर हैं. जिस नकल के द्वारा बैनामा निष्पादित कराया गया है, वह नकल पूर्णत: नकली है. इसमें फर्जी सील व फर्जी हस्ताक्षर हैं. इसे मेरे द्वारा जारी नहीं किया गया. लिखावट भी मेरी नहीं है. नकल में लगे टिकट भी तहसील नकल शाखा के नहीं हैं.

  •  नहीं बिक रहा डोड़ा चूरा

मंदसौर. मंदसौर जिले के अफीम उत्पादक किसानों का करोड़ों रुपयों का डोड़ाचूरा इस वर्ष अभी तक नहीं खरीदा गया है. किसान दर-दर भटक रहे हैं, परंतु उनका डोड़ाचूरा कोई खरीदने नहीं आ रहा है.

तीस हजार किसानों के यहां लगभग 50 हजार क्विंटल से अधिक डोडाचूरा पड़ा है.मात्र पांच हजार क्विंटल डोडाचूरा ही अभी तक बिका हैै.  शासन इस वर्ष किसानों से डोड़ाचूरे का खरीदी मूल्य 100 रू. क्विंटल तय तो कर दिया किंतु खरीदी तय नहीं की. यह जिला प्रमुख अफीम उत्पादक जिला है. हजारों किसानों की अफीम की नगद फसल प्रमुख आकर्षण का केंद्र रहती चली आ रही है. अफीम से ज्यादा डोड़ेचूरे से आमदनी होती है.

इसीलिए कुछ वर्षों में यह धंधा इतना फला-फूला कि देखते देखते ही इसका ठेका अकेले मंदसौर जिले का 27 करोड़ रूपये पर जा पहुंचा था. म.प्र. में कोई 100 से अधिक डोडाचूरे की दूकाने खोल दी गई थी. अभी भी प्रदेश के कई जिलों में डोडïाचूरा विक्रय की दूकानें खुली हुई है. उधर केंद्र ने डोडाचूरा रूपी अफीम के नशे को धीरे धीरे समाप्त करने के लिए कठोर कदम उठाना शुरू कर दिये. म.प्र. में 2009-10 मंदसौर जिले का डोड़ाचूरे का ठेका 27 करोड़ रुपए में गया था. उसे मात्र 11 करोड़ 50 लाख में दे दिया गया. 2011-12 में यह ठेका 33 लायसेंसियों को एक करोड़ रुपए में दिया गया. किसानों के हित में तो इसके पूर्व कोई 16 करोड़ रूपये का घाटा किसके लिए उठाया था.

  •  टमाटर प्रसंस्करण का झुनझुना

झाबुआ, सरकारें किसानों को मदद करने के चाहे जितने वादे और दावे करे लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और है. झाबुआ जिले की पेटलावद तहसील में देश का श्रेष्ठतम टमाटर पैदा होता है, जो मुंबई, दिल्ली, बेंगलौर, अहमदाबाद सहित बरासते वाघा बार्डर पाकिस्तान तक जाता है.लेकिन टमाटर उत्पादन में किसानों को  दिक्कतें झेलना पड़ती हैं. इस बाबद न तो केन्द्र सरकार कुछ करने को तैयार है और ना ही प्रदेश सरकार किसानों की सुध लेने का कोई कदम उठा रही है. प्रदेश कांगे्रस अध्यक्ष और यूपीए सरकार में केन्द्रीय कृषि मंत्री रहे कांतिलाल भूरिया ने अपनी कई जनसभाओं से क्षेत्र के किसानों से यह वादा किया था कि वे इलाके में टमाटर प्रसंस्कण इकाई स्थापित करने के लिए केन्द्र सरकार के खजाने का मुंह झाबुआ की ओर खोल देगे, लेकिन ऐसा आज तक न हो सका.

मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने अनेक मंचों से क्षेत्र में टमाटर उद्योग लगाने व टमाटर उत्पादक किसानों को कई तरह की सुविधाएं मुहैया कराने की बातेें की थीं, लेकिन उन पर आज तक अमल नहीं हो सका. अलबत्ता यहां का किसान अपनी मेहनत की गाढ़ी कमाई दलाल और बिचौलियों के हाथों लुटता देखता रहा.

क्षेत्र में कोई 10 हजार किसान परिवार प्रतिवर्ष 2 लाख मोटर टमाटर पैदा करता है, लेकिन मंहगे बीज और कीटनाशक खाद खर्च करने के बाद जो कुछ बचता है उसका भी बड़ा हिस्सा बिचौलियों की जेब में चला जाता है. नतीजा किसान की आर्थिक स्थिति ढांक के तीन पात जैसी  बनी रहती है. क्षेत्र के किसान लक्ष्मणसिंह मुणिया का कहना है कि टमाटर पैदा करना मजबूरी है, क्योंकि टमाटर एजेंटों से अग्रिम धनराशि लेकर किसान चक्रव्यूह में फंस जाता है. टमाटर के उत्पादन की बढ़ती लागत ने कई किसानों को क्षेत्र में कर्जदार बना दिया है.

हालांकि टमाटर के ट्रेडिंग करने वाले जरूर पनप गए. क्षेत्र में कीटनाशक, रासायनिक खाद और बीजों का व्यापार भी फला-फूला है लेकिन वास्तविक टमाटर उत्पादक की हालत  बिगड़ती जा रही है. दिल्ली के आजादपुर मंडी में जब टमाटर के भाव नीचे गिरते हं तो किसानों के घरों में मातम छा जाता है, हालांकि ऐसा कम ही होता है कि 28-30 किलो के कैरेट 400-500 रुपयों के भाव में बिकते हो. प्राय: प्रति कैरेट 125-150 रुपए कीमत ही किसानों को मिल पाती है, जबकी एक कैरेट टमाटर उत्पादन में 90-100 रुपये की लागत किसानों को आती है. पेटलावद के टमाटर उत्पादक भेरूलाल सोलंकी के अनुसार जब तक सरकार टमाटर के व्यवसाय में दलाली पर अंकुश लगाते हुए समर्थन मूल्य नीति लागू नहीं करती तब तक किसानों की दशा सुधरने वाली नहीं है.

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