केंद्रीय सरकार के सातवें वेतन आयोग की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि केंद्रीय कर्मचारियों का न्यूनतम वेतन 7000 रुपये से उसमें 11,000 रुपये बढ़ाकर 18,000 रुपये प्रतिमाह कर दिया गया है. वही दूसरी ओर इनका एक विरोधाभास भी हुआ है कि गत 70 वर्षों में वेतन आयोगों में जितने प्रतिशत वेतन बढ़ाया जा चुका है वह इस बार उनमें सबसे कम है.

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 29 जून को सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को मंजूर कर दिया. इस बार वेतन व भत्तों में 23.5 प्रतिशत की वृद्धि की गयी है और पेंशन में 0.5 प्रतिशत अधिक कर उसे 24 प्रतिशत कर दिया गया है.

वहीं दूसरी ओर सरकारी अधिकारियों का अधिकतम वेतन 90,000 प्रतिमाह में एक लाख 60 हजार बढ़ाकर उसे 2 लाख 50,000 रुपये किया गया है. इस तरह अब सरकार का न्यूनतम वेतन 18,000 और अधिकतम वेतन 2 लाख 50 हजार होगा. अधिकतम वेतन केंद्र सरकार के केबीनेट सेक्रेटरी और तीनों सेना प्रमुखों को दिया जाता है.

इससे पहले सन् 2008 में केंद्रीय कर्मचारियों को 6ठवां वेतन आयोग के आधार पर वेतन वृद्धि की थी. यह भी एक रिवाज बन गया है कि इसके बाद राज्यों के कर्मचारी भी सातवें वेतन आयोग के समान ही उनके वेतनमानों में वृद्धि मांगते है और कुछ हीला हवाला कर राज्यों में वेतन कमेटी बनायी जाती है और उनकी भी वेतन वृद्धि हो जाती है. मध्यप्रदेश में कर्मचारी खासकर शिक्षक वर्ग अभी भी छठवें वेतन आयोग के अनुसार वेतन मांग रहे हैं.

पिछली वेतन वृद्धि 2008 में हुई थी. जिसमें छठवें वेतन आयोग ने 20 प्रतिशत वृद्धि का कहा था जिसे लागू करके दुगना कर दिया था. वेतन आयोग की प्रथा में एक बड़ी समस्या यह होती है कि जब तक रिपोर्ट आती है और उस पर निर्णय होता है उस समय तक उपभोक्ता मूल्य बढ़कर कहीं के कहीं पहुंच जाते हैं. इसके अनुपात में वेतन वृद्धि नहीं होती है. इससे वेतन वृद्धि और मूल्य वृद्धि के तारतम्य सब दिया-लिया बराबर हो जाता है और कभी कम भी पड़ जाता है.

7वें वेतन आयोग की सिफारिशें गत नवम्बर में सरकार को सौंपी गयी थीं और उसे काम करने में इसमें पहले साल भर से भी ज्यादा समय लगा था. उस समय दालों का मूल्य 200 रुपये प्रति किलो नहीं था.

इसमें एक करोड़ केंद्रीय कर्मचारियों को लाभ होगा. सरकार के बजट पर पर एक लाख करोड़ रुपयों का अतिरिक्त भार आयेगा जो सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 0.7 प्रतिशत है. आम बजट से इसमें 73,650 करोड़ रुपये दिये जायेंगे और 28,450 करोड़ रुपये रेलवे अपने कर्मचारियों को रेल बजट में देगी.
इस बार बेसिक वेतन में 14.27 प्रतिशत की वृद्धि हुई है और यह 1 जनवरी 2016 से लागू होगी. कर्मचारियों को 6 माह की वृद्धि के एरियर्स मिलेंगे.

यह तो होता आ रहा है और होता चला जायेगा कि वेतन बढ़ते ही जायेंगे लेकिन आम जनता यह चाहती है कि उसे सरकारी काम में तेजी फुर्ती और जनकल्याण भी बढ़ता नजर आए. साथ यह भी देखा जाता है कि सरकारें वेतन आयोग के अंतर्गत वेतन वृद्धि तो कर देती है लेकिन वेतन आयोग इस संदर्भ में जो अन्य अनुशंसाएं करते हैं उनको लटकाये रखते हैं और कर्मचारी वर्ग भी बढ़े वेतन के उत्साह में उन पर शिथिल हो जाते हैं.

सरकार को यह अपेक्षा है कि उस वेतन वृद्धि से उपभोक्ता बाजार में खरीददारी बढऩे से आर्थिक वृद्धि होगी. जहां तक आर्थिक वृद्धि की बात है वह तो ठीक है लेकिन इसमें जो संभावित मूल्य वृद्धि होगी वह वेतन वृद्धि को ही बेअसर कर देगी.

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