khandwaखंडवा,  आँखें बुजुर्ग जरूर हो गईं। उनमें वही पैनापन। हाथों की उंगलियों में वही ब्रश पकडऩे का स्टाइल,जो जवानी के दौर में हुआ करता था। थके जैसे दिखने वाले शरीर में वही स्फूर्ति और ताकत जो जिंदगीभर बरकरार रही।

चित्रकला में जिसने 80 की उम्र में भी नई विधाओं से देश में लोहा मनवा दिया। हर धर्म के धर्मस्थलों में उसकी कारीगरी पूजी जा रही है। वो कलाकार खंडवा के बजरंग चौक स्थित महावीर जैन मंदिर में असली सोने से मूर्तियों के आसपास बेल बूटे से लेकर डिजाईन बना रहा है। उस बुजुर्ग कलाकार का नाम है बालकृष्ण गायकवाड़। वे सनावद के रहने वाले हैं। तीन पीढिय़ों से राजा रजवाड़ों के महलों में चित्रकला की कारीगरी करते आए हैं।

जैन मंदिर में पिता के साथ ही मनोज और राकेश भी अपनी हाथों की कला से इस कार्य में सहयोगी बने हैं। उनके पिता रामचंद्र गायकवाड़ भी होलकर राजाओं के महलों में चित्रकला करते थे। उनके यहाँ आने वाले अंग्रेज इंग्लैंड तक कलाकृतियाँ ले जाते थे। 1929 के आसपास इंदौर में स्थित लालबाग, माणकबाग, इंद्रभवन, अनूप भवन व जैन मंदिरों में सोने को गलाकर व वरक से कारीगरी की तो चित्र भी जीवित हो उठे थे। होलकरों के यहाँ आने वाले अंग्रेजों ने रामचंद्र को इंग्लैंड ले जाने को कहा। उनके पिता इसलिए नहीं गए कि वतन उन्हें सबसे ज्यादा प्यारा था। बुजुर्ग बालकृष्ण गायकवाड़ पिछले चार महीनों से बजरंग चौक स्थित दिगंबर जैन मंदिर में मूर्तियों के पास बने बुर्ज व संगमरमर के गुंबदों पर पेंटिंग कर रहे हैं।

इसमें सोने से कारीगरी की जा रही है। देश में इस तरह का काम करने वाला इनका पहला परिवार है। करीब 5 लाख रुपए का सोना जैन भक्त दे चुके हैं। जिसका काम अंतिम चरण में है।

मंदिर के सचिव सुनील जैन के बताया कि यहां समाजजनों ने यह कला देखी और मंदिर की मूर्तियों के आसपास कारीगरी देखी तो मोहित होकर सोने की अंगूठी व अन्य जेवर तक उतारकर मंदिर में ही रख गए और कईयों ने इस कार्य के लिए अपनी दान राशि जमा की। काम अब भी जारी है। खंडवा के ही अन्य जैन मंदिरों में इस तरह की नक्काशी की जा चुकी है। अब जब मंदिर पूरी कलाकृति से पूर्ण हो रहा है तो मंदिर की भव्यता में चार चांद लग गए हैं। चमत्कारी व आकर्षक मूर्तियों के बीच इस कला से मंदिर का निखार और बढ़ गया है।

भगवान आदिनाथ, महावीर व शांतिनाथ की मूर्तियों के पीछे बालकृष्ण की बनाई कलाकृति भक्त को अपनी ओर खींचती नजर आती है। इस पर उन्होंने बताया, मैं तो जैन नहीं हूं। लेकिन काम से पहले दर्शन करता था तो पीछे मुझे कल्पवृक्ष दिखता था। मैं कलाकारी को ही भगवान का रूप भी मानता हूँ। मैंने बेल बूटे खींचकर नई तरह का कल्पवृक्ष बना दिया। आज वह मूर्तियों के पीछे से दर्शन करने आने वाले श्रद्धालु के जेहन में झांकता है, तो मुझे भी कुछ तो पुण्य मिलता होगा।

बालकृष्ण ऐसे 80 वर्षीय चित्रकार हैं, जो आज भी कूची जहाँ रखना चाहते हैं, वहीं रखाती है। इसमें उनके सधे हाथ व इस उम्र में भी पैनी नजर का समन्वय साफ दिखता है, जो आश्चर्यजनक या कहें भगवान का आशीष ही है।

उनके पिता रामचंद्र के बारे में बताते हैं कि इंंदौर में रजवाड़ों के यहाँ चित्रकार थे। जैन मंदिरों के काम के लिए सनावद ले आए। यही काम करते चार पीढ़ी निकल गई। आज तक आर्डर खत्म नहीं हुए। बालकृष्ण की विशेषता है कि उन्होंने जैन धर्म के धर्मस्थलों ही नहीं। हिंदू मंदिरों, मस्जिदों, गिरजाघरों और गुरूद्वारों में भी महीन कारीगरी की है। पारसी धर्म के स्थलों पर काम नहीं कर पाए इसका मलाल जरूर है।

सनावद की जरदार चौक मस्जिद में बेहतरीन काम आज भी लगता है कि नया ही बनवाया होगा। वे इंग्लैंड के कलर यूज करते हैं, जो काफी महंगे होते हैं। ओंकारेश्वर के कुछ मंदिरों, धर्मशालाओं में बनाए चित्रों को देखकर लगता है वे बोल उठेंगे या बातें करने को बेताब हों। बड़वाह व सनावद के सिख क्यों पीछे रहते? उन्होंने भी इस कलाकार को अपने धर्मस्थलों में काम दिया और चित्रकारी करवाई। गुरूद्वारों में बाहर से आने वाले श्रद्धालु पूछते हैं कि यह कलाकार कौन है? सनावद व भीकनगांव के चर्चों में सुंदर उड़ती परियाँ देखकर लोग दांतों तले उंगली दबा लेते हैं।

उन्होंने जैनियों के पचासों तीर्थों में काम किया। बड़वानी के बावनगजा, हस्तिनापुर ,औरंगाबाद मंदिर, सांगली, ऊन के पावागिरी, सिद्धवरकूट के जैन मंदिरों में काम की बारीकी सबको हैरत में डाल देती है। ऊन के पावागिरी में मंदिर की छत पर भगवान महावीर की माता को चित्रकारी से सोलह स्वप्न उस समय देखते बताया है, जब भगवान का इस धरती पर पर्दापण होने वाला था। मंदिर के अलग-अलग दिशाओं के दरवाजों से घुसने पर लेटी हुई मुद्रा में माताजी दर्शक की तरफ ही करवट में दिखाई देती हैं। यह अचानक हुआ। बालकृष्ण के मुताबिक चित्र बनाते वक्त नहीं सोचा। मंदिर की छत अंडाकार मुद्रा में थी। जिस तरफ से देखो वह थ्री डी की तरह श्रद्धालुओं को आज भी दिखती है। यह भगवान और विज्ञान का चमत्कार है। मैंने कुछ विशेष नहीं किया था कि सब दिशाओं से चित्र देखने वाले की तरफ मुंह करता दिखे।

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