मन्दाकिनी का नया जीवन चित्रकूट के लिए आवश्यक

सरकार और जनसहयोग की कोशिशें उतनी असरकारी नहीं

डॉ. संजय पयासी
सतना: भगवान राम की तपोस्थली में माता अनुसुइया के प्रताप से चित्रकूट में सहस्त्र धारा में प्रगट हुई मन्दाकिनी को गंगा का ही रूप माना जाता है. पर वर्तमान में इतना आध्यात्मिक महत्व रखने के बाद भी इसकी धार टूटने लगी है. तमाम कोशिशों के बावजूद गर्मियों के दिनों में घटते पानी को देखते हुए सभी की चिंताएं बढ़ जाती हैं.भगवान राम की तपोस्थली होने के कारण दुनिया के नक्शे में आ चुके चित्रकूट का यह दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि देवी-देवताओं के प्रताप से उत्पन्न हुई जलधाराएँ धीरे-धीरे विलीन होती जा रही हैं. कहने के लिए गोदावरी, पैयसुनि, सरजू और मन्दाकिनी किसी समय तीनों अपने अस्तित्व में थी. हालांकि गोदावरी का मार्ग गुप्त है, इसलिए इसे गुप्त गोदावरी कहा जाता है. इसके बहने के कोई निशान नहीं मिलते.

फिलहाल बरसती नदियों में तब्दील हो चुकी पैयसुनि भी का भी कोई खास स्वरूप नहीं बचा. कामदगिरी पर्वत से निकलने वाली सरजू की जलधारा अब पूरी तरह से लुप्त हो चुकी है. अतिक्रमण और जंगल की अवैध कटाई इसके ऊपर माफियाओं का उत्खनन चित्रकूट के स्वरूप पर कालिख मल रह है लेकिन कोई भी इन अनैतिक गतिविधियों पर अंकुश नहीं लगाता है. हालात इतने खराब हो चुके हैं कि मन्दाकिनी की धार के ऊपर भी लोगों ने स्थाई निर्माण कर जिसका जैसा मन पड़ा उसको वैसा मोड़ दिया है. कुछ मामलों में एन जी टी ने आपत्ति भी की पर बाद में स्थानीय प्रशासन ने कार्रवाई की खानापूर्ति कर पूरे मामले की ही लीपापोती कर दी.

अपने अस्तित्व के संकट के कारण कराह रही इन नदियों का जब भी पूरी तरह नामों निशान मिट जाएगा, यह तय है कि चित्रकूट की पहचान समाप्त हो जाएगी. धीरे-धीरे कंक्रीट के जंगल मे तब्दील हो रहे चित्रकूट का तपोवन उसकी पहचान का बड़ा हिस्सा है. दुनिया में शायद ही ऐसा कोई जंगल हो जहां औषधि और आहार के उत्पाद दोनों मिलते हो. माफियाओं ने जंगल की सम्पदा को लगभग समाप्त कर दिया है. अब उनकी निगाह नदियों और पहाड़ों पर है. आस्था और श्रद्धा को तिलांजलि दे व्यक्तिगत लाभ के पीछे विकास के नाम पर अंधी दौड़ में शामिल लोग शायद यह भूल चुके हैं कि आने वाली पीढ़ी को वो विरासत में जो देकर जाएंगे उसमें उसकी पहचान नहीं होगी.

तीन विकल्पों पर विचार होः डॉ त्रिपाठी
मन्दाकिनी के लिए वर्षो से प्रयास कर रहे गायत्री शक्तिपीठ से जुड़े डॉ राम नारायण त्रिपाठी ने कहा कि मन्दाकिनी को नवजीवन देने के लिए तीन विकल्पों पर विचार किया जा सकता है. पहला नदी के किनारों से लगे जल स्रोतों को अतिक्रमण मुक्त करा उन्हें पुनर्जीवित किया जाए. दूसरा सरकार की योजना के अनुसार झूरी नदी में बांध बना उसमे इकठ्ठा होने वाले नर्मदा जल के प्रवाह से मन्दाकिनी को सदानीर बनाया जाए. तीसरा पहाड़ के बरसाती नालों को बांध कर उसमें जल संरक्षित किया जाना चाहिए ताकि पानी का जलस्तर और प्रवाह को निरन्तरता मिल सके.

नव भारत न्यूज

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