भोपाल, 16 अप्रैल, नभासं. उरॉव आदिवासी सरना सामाजिक एवं सांस्कृतिक समिति के तत्वावधान में उरॉव आदिवासी एसोसिएशन के परिसर में सरहुल पूजोत्सव का आयोजन सम्पन्न हुआ. कार्यक्रम में मुख्य अतिथि थ्रिफ्ट संस्था के संचालक जगरनाथ उरॉव, पार्षद किशन चुरैंद्र, अतिथि आर.के. उईके तथा अध्यक्षता बानेश्वर भगत ने की.

उरॉव आदिवासी सरना सामाजिक एवं सांस्कृतिक के अध्यक्ष बनेश्वर भगत ने कहा कि आदिवासी समाज आदिकाल से प्रकृति के उपासक रहे हैं. यह समाज प्रकृति को ही भगवान मानता है. उरॉव आदिवासी लोगों की धारणा है कि फसल काटने के बाद धरती कुंवारी होती है इसलिये बिना ‘सरहुल’ पूजोत्सव मनाये लोग खेतों में हल नहीं उतारते. इस त्यौहार में सामाजिक धार्मिक एवं सांस्कृतिक तीनों का सामंजस्य एक साथ देखने को मिलता है जिसके मनयोग से चिंतन और मनन से आत्मा को शांति मिलती है. इसी कारण आदिवासी जिस क्षेत्र में जहां-जहां रहता है इस त्यौहार को बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है जो कि आदिवासी समुदाय को प्रकृति को और नजदीक लाने का प्रयास करता है.

समिति के संरक्षक एवं संचालक थ्रिफ्ट सोसायटी भेल एवं मुख्य अतिथि जगरनाथ उरॉव ने समाज के लोगों को सरहुल का अर्थ बताते हुये कहा कि सरहुल पूजा प्रकृति के फूलों का त्यौहार है. आदिवासी समाज में प्रकृति की पूजा सदियों पूर्व से होती आ रही है. सरहुल का अर्थ है फूल. चैत्र का चांद उग जाता है तो द्वितीया से पंचमी तिथि तक आदिवासी इलाका फूलों के पर्व को मनाने के लिये बौरा जाता है. बौराये क्यों नहीं बौर की प्यारी महक मन को बौराये बिना छोड़-तान. या सुनहरा मौसम जो होता है हर वृक्ष, हर डाली पर फूल और फ उग जाते हैं. ठूंठ में भी न जुकक लिये फूट पड़ती है. सारा जंगल लहक उठता है.

पलास के फूलों से महुआ की लुहलु हक थई पाती अलग आमंत्रण देती है. साखू की प्यारी भीनी सुगंध मन में शांति प्रदान करती है. सारा वन प्रांत गमगमा उठता है. लतायें नई कोंपलें लिये पेड़ों से लिपट जाती हैं. फूलों से तितलियों के नेह वन पंखियों के कलख उमंग भरते हैं. ऐसे ही मादक मनमोहक वातावरण में आदिवासियों का वसंतोत्सव यानि ‘सरहुल पूजा’ सम्पन्न होती है. वन तथा वृक्ष की पूजा से संबंधित यह महत्वपूर्ण त्यौहार है. ऋतुराजा वसंत के आगमन के साथ ही उरॉव जनजातियां समाज इस पर्व के आगमन की प्रतीक्षा करने लगता है.

उरॉव जनजाति समाज की गौवशाली प्राकृतिक धरोहर का नाम है सरहुल. यही धरोहर मानव सभ्यता, संस्कृति एवं पर्यावरण की रीढ़ भी है. वहीं पार्षद किशन चुरैंद्र ने एकता बनाये रखने के अलावा सांस्कृतिक कला को बनाये रखने पर बल दिया. उन्होंने युवाओं का आह्वïान करते हुये कहा कि शिक्षा मन लगाकर ग्रहण करें. पूजा के उपरांत गाना बजाने का आयोजन किया गया. इस दौरान हर दिशा और हर कोने में आदिवासी समाज के लोग पहान और पूजा स्थल से लाये गये फूल के साथ नाचते-गाते हैं. इस अवसर पर चायनुम-चायनुम नैगायो भला बेलर र्बेज्जरे आलगदाय खद्दी पइरी नैगायो भला बेलरले खार्बेज्जेर आलगदाय जैन गीत गूंजते रहे.

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