लालकृष्ण को उदारवादी ‘अटल बनाने की कोशिश’

नवभारत समाचार सेवा
नई दिल्ली, 1 अक्टूबर. भाजपा में प्रधानमंत्री पद को लेकर भले विवाद दिख रहा हो लेकिन लालकृष्ण आडवाणी मैदान से बाहर नहीं हैं. आडवाणी बनाम मोदी लड़ाई दिखाकर अपने वोट बैंक को मजबूत करने की कोशिश में पार्टी है.’

भाजपा यह जरूर चाहती है कि फिलहाल भाजपा में प्रधानमंत्री पद की लड़ाई के बजाय पार्टी अपनी ताकत बढ़ाने पर ध्यान दें. दूसरे आडवाणी बनाम मोदी लड़ाई दिखाकर अपने वोट बैंक को मजबूत करने की कोशिश में भी पार्टी है.

इससे भाजपा को फायदा ये दिख रहा है कि परम्परागत हिंदुत्व और विकास की चाह रखने वाले लोगों का ध्रुवीकरण नरेन्द्र मोदी के लिए हो और दूसरे सहयोगी दलों की सामंजस्य की राजनीति के लिए ध्रुवीकरण लालकृष्ण आडवाणी के लिए हो. भाजपा इस बहाने लौहपुरूष लाल कृष्ण आडवाणी को उदारवादी ‘वाजपेयी’ बनाने की कोशिश में है. भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में प्रधानमंत्री पद की लड़ाई पर कोई चर्चा न तो होनी थी और न हुई पर माहौल ऐसा बना कि भाजपा पर यह मुद्दा छाया रहा. भाजपा की कार्यकारिणी में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के न आने से यह मुद्दा जरूर छाया रहा लेकिन इसमें भी भाजपा अपने मकसद में सफल रही.

भाजपा में अटलविहारी वाजपेयी के बाद लालकृष्ण आडवाणी को शिखर पुरुष के तौर पर ही देखा जा रहा है लेकिन उनको राजनीति में अभी वह मुकाम हासिल नहीं हो पाया है जो वाजपेयी को विरासत में मिला था. संघ इसी कोशिश में लगा हुआ है कि कैसे भी 2014 के लिए वाजपेयी की जगह भरी जाए. वाजपेयी के बगैर आडवाणी के नेतृत्व में पिछले लोकसभा चुनाव का जो हश्र हुआ उससे पूरी पार्टी में नए समीकरण पर काम करने की आवश्यकता जताई जा रही है. भाजपा में यह मानकर चला जा रहा है कि भाजपा अकेले हिंदुत्व के बल पर टिक नहीं सकती. भाजपा के इस वोट बैंक के नए आदर्श नरेन्द्र मोदी हैं जिन्होंने इसे अपने नए विकास के मॉडल की मजबूत नींव पर विकासपरक राजनीति का नया चेहरा भी दिखाया है. पर भाजपा का अकेले मोदी के मॉडल से काम नहीं बनेगा क्योंकि उनके खिलाफ सबसे बड़ा वर्ग मुस्लिम का होगा जिसका सीधा फायदा भाजपा कांग्रेस को नहीं होने देना चाहती और इसी मकसद से सामंजस्य और सहयोगी दलों के साथ तालमेल की राजनीति का आइकन लालकृष्ण आडवाणी को बनाने की कोशिश हो रही है.

भाजपा की कोशिश यह भी है कि अपने सहयोगी दलों की संख्या बढ़ाए क्योंकि एक मात्र गैर भाजपाई सोच का सहयोगी दल जद यू है जिसके साथ वह संबंध खराब नहीं करना चाहती. भाजपा को गुजरात भी देखना है और बिहार भी, इसलिए इस सामंजस्य के खेल को खराब न करके भाजपा आडवाणी को नई रथ यात्रा से नए आडवाणी का उदारवादी चेहरा देकर प्रस्तुत कर रही है.

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