नई दिल्ली, 23 जुलाई. नवनिर्वाचित राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने सोमवार को कहा कि वह 2001 में संसद पर हुए हमले के दोषी अफजल गुरु की दया याचिका पर तबतक टिप्पणी नहीं करेंगे, जबतक कि वह पदभार ग्रहण करने के बाद मामले का अध्ययन नहीं कर लेते।

मुखर्जी ने कहा, मैं जबतक पदभार ग्रहण नहीं कर लेता और इस मुद्दे की स्टडी नहीं कर लेता, मैं अफजल गुरु पर टिप्पणी नहीं कर सकता।’ गौरतलब है कि प्रणव एक दिन पहले ही देश के 13वें राष्ट्रपति के रूप में भारी वोटों से निर्वाचित हुए हैं। उनकी टिप्पणी ऐसे समय में आई है, जब शिवसेना ने मांग की है कि उन्हें गुरु की दया याचिका खारिज कर देनी चाहिए। राष्ट्रपति चुनाव में शिवसेना ने मुखर्जी का समर्थन किया था। शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने कहा था, आपसे हमारी कई अपेक्षाएं हैं। हम आपसे आग्रह करते हैं कि अफजल गुरु की दया याचिका खारिज कर दें और उसे फांसी पर लटका दें। प्रणव दा आपको इस काम को प्राथमिकता के आधार पर करना चाहिए और देश के राष्ट्रपति के रूप में अपना करियर शुरू करना चाहिए। हम आपसे इसकी अपेक्षा करते हैं। प्रणव को राष्ट्रपति चुनाव में न केवल सत्ताधारी कांग्रेस नेतृत्व वाले यूपीए के घटकों का समर्थन मिला, बल्कि जेडीयू और शिव सेना जैसे दलों ने अपने गठबंधन से बाहर जाकर प्रणव का समर्थन किया।

उन्होंने कहा, मैं खास से इस बात से खुश हूं कि जो लोग हमारी पार्टी से संबंधित नहीं हैं और उन्होंने वादा किया था, उन सभी ने अपना वादा निभाया और मुझे वोट दिया। सामान्य तौर पर ऐसा नहीं होता। मैं इसे अपने सार्वजनिक जीवन को एक बड़ा पुरस्कार मानता हूं। मिरती से रायसीना हिल तक का एक लंबा सफर रहा है। मैं बचपन में बहुत शैतान था। मैं हमेशा मुश्किल से जूझता रहता था। प्रणव बुधवार को शपथ ग्रहण करेंगे और उसके बाद राष्ट्रपति भवन जाकर देश के राष्ट्रपति का कार्यभार ग्रहण करेंगे।

चुनौतियां कम नहीं
प्रणब मुखर्जी भारत के 13वें भाग्यशाली व्यक्ति हैं, जिन्हें प्रथम नागरिक होने का दर्जा मिला है। लेकिन राष्ट्रपति चुनाव जीतने के बाद भी प्रणब मुखर्जी के सामने चुनौतियों की कमी नहीं है।
उधर, कांग्रेस के सामने चुनौती एक नया संकटमोचक खोजने की है, जो प्रणब की गैरमौजूदगी में उसे तमाम संकटों से निजात दिला पाए। प्रणब मुखर्जी के परिवारवाले खुश हैं कि दादा राष्ट्रपति बनकर अब आराम की जिंदगी जिएंगे। एक लंबे और सक्रिय राजनीतिक जीवन में उनके पास इसी चीज की सबसे ज्यादा कमी थी।लेकिन राष्ट्रपति भवन में कई ऐसी चुनौतियां दादा का इंतजार कर रही है, जो इस योजना में अड़ंगा डाल सकती हैं।

सबसे बड़ी चुनौती उन दया याचिकाओं को निपटाना है जिन पर राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने कोई फैसला नहीं लिया। प्रतिभा पाटिल ने फांसी की सजा पाए 16 दोषियों की दया याचिका पर कोई फैसला नहीं लिया। इनमें अफजल गुरु की दया याचिका भी है। अफजल गुरु को 2001 में संसद पर हुए हमले के मामले में फांसी की सजा दी गई है। उसे फांसी न दिए जाना राजनीतिक विवाद की वजह बनता रहा है।

प्रणव मुखर्जी के सामने राष्ट्रपति भवन को नई गरिमा देने की भी चुनौती है। निवर्तमान राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के कार्यकाल के दौरान, उनके परिवार से जुड़े कई विवादों ने राष्ट्रपति भवन की चमक को फीका किया। यही नहीं, कांग्रेस से लंबे जुड़ाव और तमाम दांव-पेच लगाकर उसके संकट दूर करने वाले प्रणव मुखर्जी के सामने खुद को पूरी तरह निष्पक्ष साबित करने की भी चुनौती होगी। उन्हें ये साबित करना होगा कि वे सिर्फ मुहर लगाने वाले राष्ट्रपति नहीं हैं।

प्रतिभा पाटिल को भावभीनी विदाई

राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल अपना कार्यकाल पूरा होने की पूर्व संध्या पर कल राष्ट्र को संबोधित करेंगी. श्रीमती पाटिल का यह संबोधन दूरदर्शन और आकाशवाणी पर शाम सात बजे से प्रसारित किया जायेगा.पहले यह संबोधन हिंदी में फिर अंग्रेजी में प्रसारित होगा. इसके बाद आकाशवाणी अपने क्षेत्रीय चैनलों पर रात साढे नौ बजे से क्षेत्रीय भाषाओं में इस संबोधन को प्रसारित करेगा. उन्हें आज कांगे्रस सहित सभी दलों के नेताओं ने भावभीनी विदाई दी।

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