भारत सरकार का खाद्य मंत्रालय इस नतीजे पर पहुंचा है कि कृषि वस्तुओं के निर्यात के बारे में अभी तक जो रवैया चला है वह व्यवस्था के हिसाब से ठीक नहीं रहा. कभी एकदम से गेहूं, चावल, शक्कर, कपास आदि का निर्यात खोल देते हैं और फिर देश में अभाव होने पर भाव बढऩे से निर्यात बंद कर देते हैं. इस साल भी यही हुआ कि देश में गन्ना उत्पादन में काफी कमी आ गई है और आने वाले दिनों में शक्कर का उत्पादन घटने की आशंका है. इससे पहले बिना नई फसल व मौसम को देखे भारत ने लाखों टन चीनी का निर्यात कर डाला है. इससे पूर्व एक बार विवेकहीन शक्कर निर्यात करने से ऐसी स्थिति आ गई थी कि भारत को शक्कर का आयात तक करना पड़ा.  विदेशों में कच्ची शक्कर का आयात किया गया जिसकी यहां की शक्कर मिलों में प्रोसेसिंग करनी थी. उसमें इतनी देरी हो गई कि वह शक्कर वक्त पर काम नहीं आ सकी. गेहूं, चावल के निर्यात में भी ऐसी आपाधापी होती रहती है. कभी निर्यात खोल दिया फिर बीच में एकाएक बंद कर दिया. इससे भारत का अंतरराष्टï्रीय बाजार व व्यवसाय जम नहीं पाता.
सरकार ने अब यह तय किया है कि गेहूं, चावल व शक्कर के निर्यात को स्थाई रूप दिया जाए. हर साल व समय न्यूनतम स्तर पर इन तीनों वस्तुओं का निर्यात किया जायेगा. इससे दोनों लाभ एक साथ मिल जायेंगे. एक तो घरेलू बाजार में इनका कभी भी अभाव न हो पायेगा और मूल्य वृद्धि नहीं होगी और दूसरी ओर विदेशी बाजारों में भारत की हमेशा उपस्थिति बनी रहेगी. अभी तक निर्यात खोलने व बंद करने की नीति का विपरीत असर यह पड़ता रहा कि कभी भारत बाजार से नदारद हो जाता था और उस स्थान पर अन्य किसी और देश की गणना होने लगती है. अभी इस साल भारत 3.15 मिलीयन टन शक्कर का निर्यात कर चुका है. इसके अलावा 2.5 मिलीयन टन गेहूं और 4 मिलीयन टन गैर बासमती चावल का भी गत सितंबर 2011 से अभी इस वर्ष सितंबर तक निर्यात हो चुका है.  रंगराजन कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में शक्कर उद्योग पर से सरकारी नियंत्रण हटाने की बात की है. जिस तरह पेट्रोल की कीमतों पर सरकारी नियंत्रण खत्म हो चुका है और तेल कंपनी पेट्रो क्रूड के भावों के अनुसार पेट्रोल के भाव बढ़ाते घटाते रहते है.
अभी शक्कर उद्योग ही एकमात्र ऐसा उद्योग है जो पूरी तौर पर केंद्र सरकार के नियंत्रण में है. इस पर उत्पादन से लेकर देश में वितरण और विश्व बाजार में निर्यात सभी कार्य विधियां सरकार के नियंत्रण  में है.  जैसे की संभावना है कि यदि शक्कर उद्योग को पूरी तरह नियंत्रण मुक्त किया गया तो शक्कर उद्योग जगत में मुनाफाखोरी, सट्टïा बाजारी व निर्यात की दृष्टिï में शक्कर के भाव तय करेंगे. और शक्कर बहुत महंगी हो जाएगी. त्यौहारों के वक्त जब शक्कर की बहुत मांग बढ़ जाती है. शक्कर उद्योग इसमें भारी मुनाफाखोरी कर सकता है. शक्कर उद्योग को शासकीय नियंत्रण में बने रहना ही आम उपभोक्ता के हित
में होगा.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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