मध्य प्रदेश में पिछले कई वर्षों से औद्योगिक निवेश के बड़ी तामझाम व खर्चे से निवेशकों के सम्मेलन आयोजित हो चुके हैं. मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान इसे अपना मिशन बनाया हुआ है कि राज्य का कृषि व औद्योगिक विकास जोरों से चल रहा है और राज्य में बम्पर फसलों व बम्पर उद्योग लगेंगे.

बम्पर फसलें तो आ गईं, लेकिन उन्हें रखने के लिये बम्पर गोदामों व परिवहन की व्यवस्था नहीं की जा सकी. नतीजा यह हुआ कि सड़कों पर तो यातायात का जाम लगता है और मध्य प्रदेश में मंडियों में समर्थन मूल्य पर खरीदी गये अनाजों के स्टाकों का जाम ऐसा लग जाता है कि ट्राफिक की तरह खरीदी में जाम लग जाता है. पूरी कोशिशें हो रही हैं कि सरकारी और निजी निवेश की गोदाम व्यवस्था राज्य भर में स्थापित हो जाये, ताकि अनाज रखा भी जाये और खुले में लाखों टन बर्बाद भी न हो.

लेकिन औद्योगिक क्षेत्र में तो हालत इससे भी बदतर है. निजी निवेशकों व उद्योगपतियों में उद्योग लगाने के कगार भी हो गये हैं, लेकिन सरकार और उद्योगपति दोनों बेकरार हैं कि उद्योगों को लगाने के लिये जमीन ही मिल रही है- उद्योग क्या हवा में खड़ा कर दें. कुछ ऐसे उद्योगपति निश्चित तौर पर हैं जिन्होंने करार के बाद भी उद्योग नहीं लगाये जैसे कोयला उपखंडों के मामले में यह बात सामने आ चुकी है कि कइयों ने काम शुरू किया है तो कई ऐसे भी हैं जो कोल ब्लाक लिये बैठे हैं और काम नहीं कर रहे हैं. अभी उनके कोल ब्लाकों का आवंटन रद्ïद भी किया गया.

जमीन कलेक्टर व कमिश्नरों को सरकार की तरफ से देना है. अभी मुख्यमंत्री की कलेक्टर कमिश्नर कांफ्रेंस में एक कलेक्टर ने भी अपनी बेकरारी बता दी कि जो जमीन खाली थी और दी जा सकती थी उसे पटवारी व तहसीलदार ने हेराफेरी करके ‘भरीÓ हुई बता दिया जिससे वह दी नहीं जा सकी. जिस प्रदेश में राज्य की महती औद्योगिकीकरण की योजना को पटवारी-तहसीलदार चौपट कर दे- वहां औद्योगिकीकरण हवाई ही रहेगा.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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