केन्द्र सरकार ने एक ओर खरीफ फसलों के समर्थन मूल्य में वृद्धि कर किसानों को राहत दी है, वहीं दूसरी ओर खाद के दामों में भारी वृद्धि कर उसे दूसरी तरह से मूल्य वृद्धि से आफत में डाल दिया. जो फसलों के माध्यम से दिया उसे खादों के माध्यम से ले लिया. अब यह किसानों का काम है कि हिसाब-किताब लगाकर देखे कि कुल मिलाकर उसे कुछ मिला है या उसके पास से निकल गया. समर्थन मूल्य बढ़ाने से बाजार में उपभोक्ताओं को धान (चावल), मक्का (कार्न फ्लेक आदि), ज्वार, उड़द की दाल व मूंगफली के दाने व खाद्य तेल, सूरजमुखी, तिल व सोयाबीन का खाद्य तेल, बाजरा, रुई और कपड़ा महंगा हो जावेगा. यह सब इसलिये किया जा रहा है कि किसानों की आय में वृद्धि होगी. लेकिन खाद की कीमतें बढ़ाने से उसकी खेती की लागत में भी काफी वृद्धि हो जायेगी.

होना यह है कि खरीफ के बाद घरों की रसोई और महंगी हो जायेगी. खादों के दाम बढ़ाने के पीछे सरकार का वही जवाब है जो अब उसका ‘तकिया कलामÓ या फार्मूला बन गया है कि सरकार पर खादों की वजह से आ रहा सब्सिडी का बोझ कम करना है. बकौल फिल्मी गीतकार व राज्यसभा सांसद श्री जावेद अख्तर के जब उद्योगों को कर छूट व सब्सिडी से प्रोत्साहन दिया जाता है तो कहा जाता है कि यह देश के आर्थिक विकास के लिये किया जा रहा है. जब आम उपभोक्ता को राशन, शक्कर, पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस पर सब्सिडी दी जाती है तो कहा जाता है कि यह सरकार पर बोझ है और इसे कम करना जरूरी है उसके लिये उपभोक्ता मूल्यों में वृद्धि की जानी जरूरी है.

अंतरराष्टï्रीय व्यापार में कौन सा ऐसा निर्यातक या आयातक देश है जो विदेशी मुद्रा की कमाई के लिए या अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के लिए अपने कारखानों के उत्पादित माल व अन्य निर्यात व्यापार पर आर्थिक सब्सिडी नहीं देता. सरकार स्वयं ही समर्थन मूल्य और खादों के मूल्य बढ़ाकर समाज में मूल्य वृद्धि के दौर को और हवा दे रही है. इसका नतीजा भी मुद्रा स्फीति में बढ़ोतरी और उपभोक्ता की क्रय शक्ति में कमी आयेगी. मूल्यों के लगातार बढऩे से मेन्युफेक्चरिंग क्षेत्र के उत्पादों में भी मूल्य वृद्धि के साथ उनका उपयोग घट जाता है. इससे औद्योगिक विकास दर में गिरावट आती है. मूल्य वृद्धि एक चक्रवृद्धि कुचक्र है. इसे सीलिंग के जरिए कहीं न कहीं रोकना होगा. वरना आगे चलकर यही होना है कि लोग झोला भर नोट ले जायेंगे और जेबों में सामान आ जाएगा.

अभी सभी खादों के मूल्यों में 141 से लेकर 232 प्रतिशत दामों में वृद्धि कर दी गई है. केवल यूरिया के दामों में फिलहाल 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी रोक दी गई है. यह भी वैसा ही लगता है जैसे पेट्रोल के दाम बढ़ाते समय डीजल, रसोई गैस के दाम नहीं बढ़ाए, लेकिन लगातार सरकार की ओर से ही यह कहा जा रहा है कि इनके दामों में तुरंत वृद्धि करनी चाहिए. मूल्य वृद्धि के इस लगातार बढ़ते दौर में अब मूल्यों को रोकने व बांधने की नीति हर क्षेत्र व उत्पादन में अपनानी चाहिए. संसार की हर आर्थिक गतिविधि का मूल आधार उपभोक्ता ही होता है. हर व्यक्ति अगर कहीं वस्तु का उत्पादक हो तो वह भी अन्य सभी वस्तुओं का उपभोक्ता होता है. उपभोक्ता सर्वोपरि सर्वव्याप्त है.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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