कुछ दशकों पूर्व पशुपालकों का रवैया बड़ा ही निर्मम व हानि लाभ का होता था. पशु के बीमार होने पर वे यह देखते थे कि इसके उपचार में खर्च कितना आएगा. उसे किया जाए या इसे मरने दिया जाए. आज हर पशु इतना महंगा हो गया है कि लोग पशुओं का उपचार कराने लगे हैं.

इस मामले में मध्यप्रदेश सरकार ने पशुओं के उपचार के लिए चिकित्सा सुविधाओं को काफी बढ़ाने का काम शुरू किया है. देसी नस्ल सुधार का काम तो राज्य के गौरव की बात है और देश को एक संदेश भी जाता है कि राज्य सरकार पशुओं के प्रति भी संवेदनशील है. ग्रामीण क्षेत्रों में ‘ई-वेट’ योजना लागू कर दी गई है और लगभग 20 हजार गौ-सेवकों को प्रशिक्षित किया गया है. राज्य में पशु चिकित्सा का श्रृंखलाबद्ध नेटवर्क शुरू किया गया है. राज्य में पशु चिकित्सा विस्तार में एक राज्य स्तरीय तथा  संभाग स्तरीय व पशु चिकित्सालय 67740 चिकित्सालय और 1744 छोटे चिकित्सालय काम कर रहे हैं.

राज्य में हाल ही में दो बड़ी ही दुखद घटनाएं हो गई कि ट्रकों ने सड़कों पर अलग-अलग स्थान पर हाथियों को जबरदस्त टक्कर मार दी और दोनों की मृत्यु हो गई. राज्य में वन्य पशुओं का शिकार भी हो रहा है. पशुओं को यह उपचार सेे भी बड़ा यह संरक्षण मिलना चाहिए कि उनकी हत्या न होने पाये. पशुओं की हत्या को भी मानव की हत्या के समकक्ष कानूनी तौर पर बना देनी चाहिए. पन्ना में एकदम से बाघों का गायब होना भी घातक है.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
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