अन्ना हजारे जन्तर-मन्तर पर फिर अनशन पर आ गये. मामला भी यही है ‘लोकपाल कानून बनाओ’. पहले बैठे थे- खूब भीड़ जुटी, फिर जाकर मुम्बई में बैठे. पर भीड़’ गायब थी- लौट के दिल्ली आये- पर भीड़ नहीं है. रामदेव बाबा ने भीड़ जुटाने की जुगाड़ लगाई है. इसमें अजीब कुछ नहीं है. हर आन्दोलन में शुरु में काफी जोश रहता है बाद में उसमें भी राजनैतिक और सार्वजनिक ‘मन्दी का दौर’ आता ही है. यही अन्ना जी के साथ भी हो रहा है. अन्ना का त्याग-तपस्या पर कोई संदेह नहीं है लेकिन उनकी टीम के लोगों में लोगों की आस्था नहीं है. ऐसा लगता है कि वे अन्ना को ‘कैश’ कर रहे हैं.

इसमें भी कोई संदेह नहीं भीड़ नेता की पूंजी होती है और पूंजी से धन मद भी उत्पन्न होता है और अन्ना भी त्यागी होने के बाद भी इस ‘भीड़ मद’ से अनियंत्रित हो गये थे. उन पर भीड़ का नशा ऐसा चढ़ा कि दिल्ली की भीड़ उन्हें पूरा हिन्दुस्तान नजर आने लगी. उन्हें यह भ्रम…. हो गया कि पूरा देश उनके साथ है. इसी नशे में उन्होंने सरकार और संसद को ऐसी भाषा में आदेश देने लगे, जैसे वे संविधान से भी ऊपर है. सरकार को कह डाला विधेयक इस प्रारूप का बनाओ, संसद में कह डाला इसी सत्र के  अंतिम दिन तक इस विधेयक को पारित करो.

लेकिन वह हो नहीं सकता था और न ही वे ऐसा आदेश दे सकते थे. इसलिए कुछ होना नहीं था और हुआ भी नहीं. उन्हें न तो सरकार ने धोखा दिया न ही संसद ने उनकी उपेक्षा की. भीड़ को देखकर वह खुद ही धोखा खा गये. अब सामान्य होते नजर आ रहे है क्योंकि अब भीड़ का नशा नहीं है. संसद के समक्ष लोकपाल विधेयक प्रस्तुत है. उस पर संसदीय प्रक्रिया चल भी रही है और वह विधेयक पारित भी होगा.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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