असम का वर्तमान भाषायी वर्गों का संघर्ष जहां राज्य व केंद्र सरकार के कानून व्यवस्था की गंभीर समस्या है वहीं वह असम के लोगों के लिए उनके अस्तित्व की समस्या है. इस समय की हिंसा व उसमें हुई लगभग 40-50 मौतें इस द्वंद के इतिहास में नगण्य हैं. असम के संकट का एक ही नाम है ”असम में बंगलाभाषी बंगलादेशियों की भारी संख्या में अवैध घुसपैठ और वहां बस जाना.” एक समय इनकी संख्या इतनी ज्यादा हो गई थी कि असम में असमभाषी भारतीय ही अल्पसंख्यक होने की कगार में आ गए. इसके विरोध में पूरा असम उठ खड़ा और जल उठा. उस समय एक नल्ली हत्याकांड हो गया जो बहुत ज्यादा मौतों का भयंकर हत्याकांड था.

आज इस बात पर सहसा विश्वास नहीं होगा कि 60 के दशक में एक समय ऐसा भी आया था कि देश में लोकसभा के आम चुनाव हो रहे थे और असम के लोगों ने यह ठान लिया था कि जब तक इन ”विदेशी नागरिकों” का नाम वोटर लिस्ट से नहीं हटाया जायेगा और इन्हें यहां से नहीं निकाला जायेगा, तब तक असम में विधानसभा या लोकसभा चुनाव नहीं होंगे और जब पूरे देश में लोकसभा के चुनाव हुए उस समय असम में नहीं हुए. इसी से यह अंदाजा हो जाता है कि असम के लोगों की यह वेदना कितनी गंभीर और उनकी मांग कितनी जायज है. छात्रों ने ”विदेशी नागरिकोंÓÓ के विरुद्ध जन आक्रोश का नेतृत्व किया और जब आगे विधानसभा चुनाव हुए तो उन्होंने ”असम गण परिषदÓÓ नाम की पार्टी बनाकर भारी बहुमत से कांग्रेस को सत्ता से हटाकर सत्ता में आ गए. इसमें सबसे विचित्र बात यह है कि बंगलादेशी भाषा के हिसाब से पश्चिम बंगाल में घुसपैठ करनी चाहिए. लेकिन असमिया भाषी असम में क्यों जा रहे हैं. बंगलादेशी असम में भारी संख्या में जाकर बस गए हैं. राशन कार्ड, वोटर लिस्ट में आ गये है. इन्हीं के कारण ”आधारÓÓ कार्ड की परिभाषा तक बदलनी पड़़ी है कि यह सिर्फ राष्टï्रीय स्तर का पहचान पत्र होगा जो बैंक, रेल जैसी सभी सेवाओं में पहचान पत्र माना जायेगा. लेकिन यह ”नागरिकताÓÓ का कार्ड नहीं होगा. जबकि प्रारंभ में आधार कार्ड की ऐसी परिभाषा नहीं थी.

सारी दुनिया की आबादी बढ़ रही है. हर देश में जब जनगणना होती है तो वहां आबादी बढ़ी ही पाई जाती है. लेकिन बंगलादेश ही संसार का एकमात्र ऐसा देश है जहां जनगणना में आबादी 17 प्रतिशत घट गई. ये लोग ही भारत में आकर बस गये हैं. इनमें से लगभग सभी झुग्गी-झोपड़ी स्तर के हैं, जो अपराधी भी हैं और देशद्रोहिता में आतंकियों के साथ भी हो जाते हैं. बंगलादेशियों की समस्या न सिर्फ असम बल्कि अब सारे देश की हो गयी है. ये लगभग सभी मुसलमान हैं.

भूतपूर्व राष्टï्रपति श्री फखरुद्दीन अहमद पर यह संगीन आरोप खुलेआम असम में लगाये गये थे कि जब वे असम राज्य सरकार के मंत्री थे, उन्होंने अपनी लीडरी को व्यापक रूप देने के लिये यह घुसपैठ शुरु करायी थी. आज ये बंगलादेशी भारत भर में फैल चुके हैं और वोटर लिस्ट में आने के लिये पूरे प्रयास करते हैं ताकि वे यहां के माने जाएं. ‘आधार’ कार्ड की आलोचना व आपत्ति में भाजपा के शीर्ष नेता श्री लालकृष्ण आडवाणी ने यही मुद्दा उठाया था कि ये कार्ड नागरिकता का प्रमाण माना गया तो ये अवैध बंगलादेशी भारत की स्थाई समस्या हो जायेंगे. लेकिन एक यथार्थ यह भी है कि ये लगभग स्थाई हो चुके हैं और इन्हें वापस भेजने का कोई काम नहीं हो रहा है.

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