नई दिल्ली, 10 मई. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश व वर्तमान में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष केजी बालकृष्णन के खिलाफ भ्रष्टाचार और गलत आचरण के मामले में शीर्ष न्यायालय ने गुरुवार को दखल देने इन्कार कर दिया। कोर्ट ने कहा है कि सरकार चाहे तो सक्षम प्राधिकरण से पूर्व मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ आरोपों की जाच करा सकती है।

सुप्रीम कोर्ट में एक एनजीओ ने जनहित याचिका दायर कर बालकृष्णन के खिलाफ भ्रष्टाचार और गलत आचरण का आरोप लगाते हुए जांच का आदेश देने की मांग की थी। बालकृष्णन पर आरोप है कि उन्होंने 2004 से 2009 के दौरान अपने रिश्तेदारों के नाम से 40 करोड़ रुपये की बेनामी संपत्ति अर्जित की है। याचिका में कहा गया है कि मानवाधिकार कानून के तहत इसके अध्यक्ष या किसी सदस्य को कदाचार या दुव्र्यवहार के आरोप में सुप्रीम कोर्ट की राय मिलने के बाद ही राष्ट्रपति पद से हटा सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति बीएस चौहान एवं न्यायमूर्ति जेएस केहर की खंडपीठ ने मामले की विशिष्ट प्रकृति का हवाला देते हुए सरकार को यह निर्देश दिया।

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति बालाकृष्णनन के खिलाफ लगे आरोप जांच के योग्य नहीं है तो वह याचिकाकर्ता एनजीओ कॉमन कॉज को इस बारे में सूचित कर दे। न्यायालय ने हालांकि कहा कि यदि सरकार समिति के बयान के पक्ष में निर्णय लेती है तो वह राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग अधिनियम की धारा 5 [2] के तहत मामले को आगे बढ़ा सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को इस याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। जनहित याचिका में बालाकृष्णन पर कदाचार के अतिरिक्त उनके दो दामादों और भाई पर वर्ष 2007-10 के बीच उनके [बालकृष्णन के] देश का प्रधान न्यायाधीश रहते हुए आय के ज्ञात स्त्रोतों से अधिक संपत्ति अर्जित करने का भी आरोप है। न्यायमूर्ति बालाकृष्णन 14 जनवरी, 2007 को देश के प्रधान न्यायाधीश नियुक्त हुए थे 12 मई, 2010 को सेवानिवृत्त होने पर उन्हें राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया गया था।

Related Posts: